भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४३६ ] ( रुद्रहृदयोपनिषत् नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् । तद्भूतयोनिं पश्यन्ति धीरा नात्मानमात्मनि ॥३२ हे शुक ! जो सनातन परम ब्रह्म सबका अधिष्ठान, मन और वाणी से अगोचर और सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, उसे जो भले प्रकार जान लेता है वह इस सम्पूर्ण रहस्य का ज्ञाता हो जाता है। क्योंकि उस ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं है। यह सब उसी का स्वरूप हैं। परा और अपरा नाम की दो विद्यायें हैं वे साधक के लिये ज्ञातव्य हैं। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, यह चारों वेद, शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष यह अपरा है। इसमें आत्म-विषय के अतिरिक्त अन्य सब प्रकार का बौद्धिक ज्ञान भरा हुआ है। परन्तु जिसके द्वारा आत्म-ज्ञान होता है वह परा विद्या है। वही परम अविनाशी आत्मतत्त्व है। वह दिखाई नहीं पड़ता, न ग्रहण किया जा सकता है। उसका नाम, रूप, व गोत्रादि कुछ नहीं है। उसके न नेत्र हैं, न कान हैं, हाथ-पाँव भी नहीं हैं। वह विषयों ने परे, नित्य, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से सर्वगत और निर्विकार है। वह सब भूतों का आश्रय स्थान है। ज्ञानी पुरुष उस परमात्मा का अपने ही आत्मा में दर्शन करते हैं ॥२६-३२॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादतन्नह्मरूपेण जायते जगदावलि ॥३३ सत्यवद्भाति तत् सर्वं रज्जुसर्पवदास्थितम् । तदेतदक्षरं सत्यं तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥३४ ज्ञानादेव हि संसारविनाशो नैव कर्मणा । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं स्वगुरुं गच्छेद्व्यथाविधि ॥३५ गुरुस्तस्मै परां विद्यां दद्याद्ब्रह्मात्मबोधिनीम् । गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद चेन्नरः ॥३६ छित्त्वाऽविद्यामहाग्रन्थि शिवं गच्छेत् सनातनम् । तदेतदमृतं सत्यं तद्वेद्धव्यं मुमुक्षुभिः ॥३७