१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३५ और उमा वाणी स्वरूप हैं। इन दोनों रूप में उमा महेश्वर को नमस्कार है। रुद्र रूप विष्णु और उमा रूप लक्ष्मी को नमस्कार है। सूर्य रुद्र हैं छाया उमा है, उनके इन दोनों रूपों को नमस्कार है। चन्द्रमा और तारा रूप रुद्र-उमा को नमस्कार है। दिवस-रात्रि रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। यज्ञ और वेदी रूप शिव और उमा को नमस्कार है। वेद-शास्त्र रूप शकर और उमा को नमस्कार है। वृक्ष और लता रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। अर्थ और अक्षर रूप शिव-उमा को नमस्कार है। लिंग और पीठ रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। इस प्रकार इन वेदात्मक रुद्र और उमा को पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिए। मैं भी इन मन्त्रों द्वारा शिव-उमा को नमस्कार किया करता हूँ। जहाँ भी, जिस स्थिति में रहना हो, वहीं इस अर्घालीयुक्त मन्त्र का जप करता रहे। जिसने ब्रह्म-हत्या की हो वह भी यदि जल में प्रविष्ट होकर इस मन्त्र को जपे तो सभी पापों से छूट जाता है ॥१७-२५॥ सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् । सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥२६ तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक । तदात्मकत्वात् सर्वस्य तस्माद्भिन्नं न हि क्वचित् ॥२७ द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा च ते। तत्रापरा तु विद्यैषा ऋग्वेदो यजुरेव च ॥२८ सामवेदस्तथाऽथर्ववेद शिक्षा मुनीश्वर । कल्पो व्याकरणं चैव निरुक्तं छन्द एव च ॥२९ ज्योतिषं च तथाऽनात्मविषया अपि बुद्धयः । अथैषा परमा विद्या ययाऽऽत्मा परमाक्षरम् ॥३० यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् । अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ॥३१