१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३५ और उमा वाणी स्वरूप हैं। इन दोनों रूप में उमा महेश्वर को नमस्कार है। रुद्र रूप विष्णु और उमा रूप लक्ष्मी को नमस्कार है। सूर्य रुद्र हैं छाया उमा है, उनके इन दोनों रूपों को नमस्कार है। चन्द्रमा और तारा रूप रुद्र-उमा को नमस्कार है। दिवस-रात्रि रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। यज्ञ और वेदी रूप शिव और उमा को नमस्कार है। वेद-शास्त्र रूप शकर और उमा को नमस्कार है। वृक्ष और लता रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। अर्थ और अक्षर रूप शिव-उमा को नमस्कार है। लिंग और पीठ रूप शंकर-उमा को नमस्कार है। इस प्रकार इन वेदात्मक रुद्र और उमा को पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिए। मैं भी इन मन्त्रों द्वारा शिव-उमा को नमस्कार किया करता हूँ। जहाँ भी, जिस स्थिति में रहना हो, वहीं इस अर्घालीयुक्त मन्त्र का जप करता रहे। जिसने ब्रह्म-हत्या की हो वह भी यदि जल में प्रविष्ट होकर इस मन्त्र को जपे तो सभी पापों से छूट जाता है ॥१७-२५॥ सर्वाधिष्ठानमद्वन्द्वं परं ब्रह्म सनातनम् । सच्चिदानन्दरूपं तदवाङ्मनसगोचरम् ॥२६ तस्मिन् सुविदिते सर्वं विज्ञातं स्यादिदं शुक । तदात्मकत्वात् सर्वस्य तस्माद्भिन्नं न हि क्वचित् ॥२७ द्वे विद्ये वेदितव्ये हि परा चैवापरा च ते। तत्रापरा तु विद्यैषा ऋग्वेदो यजुरेव च ॥२८ सामवेदस्तथाऽथर्ववेद शिक्षा मुनीश्वर । कल्पो व्याकरणं चैव निरुक्तं छन्द एव च ॥२९ ज्योतिषं च तथाऽनात्मविषया अपि बुद्धयः । अथैषा परमा विद्या ययाऽऽत्मा परमाक्षरम् ॥३० यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रं रूपवर्जितम् । अचक्षुःश्रोत्रमत्यर्थं तदपाणिपदं तथा ॥३१
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४३६ ] ( रुद्रहृदयोपनिषत् नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् । तद्भूतयोनिं पश्यन्ति धीरा नात्मानमात्मनि ॥३२ हे शुक ! जो सनातन परम ब्रह्म सबका अधिष्ठान, मन और वाणी से अगोचर और सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, उसे जो भले प्रकार जान लेता है वह इस सम्पूर्ण रहस्य का ज्ञाता हो जाता है। क्योंकि उस ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं है। यह सब उसी का स्वरूप हैं। परा और अपरा नाम की दो विद्यायें हैं वे साधक के लिये ज्ञातव्य हैं। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, यह चारों वेद, शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष यह अपरा है। इसमें आत्म-विषय के अतिरिक्त अन्य सब प्रकार का बौद्धिक ज्ञान भरा हुआ है। परन्तु जिसके द्वारा आत्म-ज्ञान होता है वह परा विद्या है। वही परम अविनाशी आत्मतत्त्व है। वह दिखाई नहीं पड़ता, न ग्रहण किया जा सकता है। उसका नाम, रूप, व गोत्रादि कुछ नहीं है। उसके न नेत्र हैं, न कान हैं, हाथ-पाँव भी नहीं हैं। वह विषयों ने परे, नित्य, विभु, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से सर्वगत और निर्विकार है। वह सब भूतों का आश्रय स्थान है। ज्ञानी पुरुष उस परमात्मा का अपने ही आत्मा में दर्शन करते हैं ॥२६-३२॥ यः सर्वज्ञः सर्वविद्यो यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादतन्नह्मरूपेण जायते जगदावलि ॥३३ सत्यवद्भाति तत् सर्वं रज्जुसर्पवदास्थितम् । तदेतदक्षरं सत्यं तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥३४ ज्ञानादेव हि संसारविनाशो नैव कर्मणा । श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं स्वगुरुं गच्छेद्व्यथाविधि ॥३५ गुरुस्तस्मै परां विद्यां दद्याद्ब्रह्मात्मबोधिनीम् । गुहायां निहितं साक्षादक्षरं वेद चेन्नरः ॥३६ छित्त्वाऽविद्यामहाग्रन्थि शिवं गच्छेत् सनातनम् । तदेतदमृतं सत्यं तद्वेद्धव्यं मुमुक्षुभिः ॥३७
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्म से ही भोक्ता एवं अन्य-रूप युक्त यह विश्व प्रकट होता है । वह ब्रह्म सर्वज्ञ एवं सब विद्याओं का आश्रयस्थान है। उसका तप ज्ञान ही है। सत्य के समान दिखाई पड़ने वाला यह विश्व रस्सी में सर्प के आभास के समान ही ब्रह्म में स्थित है। यह विश्व असत्य है, परन्तु ब्रह्म अविनाशी एवं सत्य है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। कर्म से संसार की पाश नहीं कटती, वह तो ज्ञान से ही छिन्न-भिन्न होती है। इसलिए मुक्ति-काम्य पुरुष को अपने ब्रह्मनिष्ठ एवं श्रोत्रिय गुरु की शरण लेनी चाहिए। वह गुरु उसे आत्मा और ब्रह्म के एक होने का ज्ञान कराने वाली परविद्या सिखावे। गुहा में अलक्षित उस अविनाशी ब्रह्म से जो पुरुष साक्षात् कर लेता है, उसके अविद्या रूपी बन्धन तो कट जाते हैं और फिर वह पुराण पुरुष शिव के समीप जाता है। अमृतरूप सत्य मोक्ष की कामना वाले साधकों के लिए ज्ञातव्य है। धनुस्तारं शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्य मुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥३८ लक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः सर्वगतो मुखः । वेद्धा सर्वगतश्चैव शिवलक्ष्यं न संशयः ॥३९ न तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशते न वान्ति तावाः सकला देवताश्च । स एष देवः कृतभावभूतः रूपं विशुद्धो विरजाः प्रकाशते ॥४० द्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिन् जीवेशाख्यौ सह स्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥४१ केवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥४२ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४३६ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् घटाकाशमठाकाशौ यथाऽऽकाशप्रभेदतः । कल्पितौ परमो जीव शिव रूपेण कल्पितौ ॥४३ तत्त्वतश्च शिवः साक्षाच्चिज्जीवश्च स्वतः सदा । चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥४४ चितश्चिन्न चिदाकाराद्भिद्यते जडरूपतः । भिद्यते केज्जडो भेदश्चिदेका सर्वदा खलु ॥४५ तर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेजत्वव्यवस्थितेः । चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति । अद्वैतं परमानन्दं शिवं याति तु केवलम् ॥४६ अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्धनम् । अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनि ॥४७ स्वशरीरे स्वयं ज्योतिस्स्वरूपं सर्वसाक्षिणम् । क्षीणादोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥४८ एवंरूपपरिज्ञान यस्यास्ति परयोगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य पूर्णस्वरूपिणः ॥४६ आकाशमेकं सम्पूर्णं कुत्र चिन्नैव गच्छति । तद्वत्स्वात्म परिज्ञानी कुत्र चिन्नैव गच्छति ॥५० स तो॒ ह वै॒ तत्पर॑मंब्रह्म॒यो वेदं॒ वै मुनिः॑ । ब्रह्म॑ वै भवति स्वस्थः सच्चिदानन्दमातृकः ॥५१ : ब्रह्म रूप लक्ष्य के लिए प्रणव धनुष रूप और आत्मा बाण के समान है । उसे बींधने के लिए आलस्य का त्याग आवश्यकीय कार्य है । उस ब्रह्म में उसी प्रकार तन्मय हो जाना चाहिए जैसे लक्ष्य की बींधने के लिए बाण क्रियारत होता है । ब्रह्म रूप लक्ष्य सर्वगत है, आत्मा सर्वतोमुख है, परन्तु यदि साधक भी सर्वगत हो तो शिवःरूप लक्ष्य की प्राप्ति निःसन्देह होती है । जिन परमात्मा के परमधाम में चन्द्र-सूर्य नहीं होते, जहाँ वायु तथा अन्य देवगण भी पहुंच नहीं पातें, वहीं पर-
रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३६ मात्मा साधक द्वारा चिंतन किये जाने पर अपने निर्मल और निर्गुण रूप से प्रकाशमान होते हैं। यह शरीर रूपी वृक्ष जीव और ईश्वर रूप दो पक्षियों को निवास देने वाला है। इनमें जीवरूप पक्षी स्वीकृत कर्मों का फल भोगता है। परन्तु ईश्वर उसके कर्म-फल भोग के साक्षी स्वरूप प्रकाशित रहता है, वह कर्म का फल नहीं भोगता। माया के द्वारा ही जीव और ईश्वर के भेद की कल्पना हुई है। यथार्थ में तो चिन्मय जीव स्वयं ही साक्षात् ईश्वर है। जीव और ईश्वर में चित् रूप उपाधि सम्बन्धी आकार भेद के कारण यह विभक्ति परिलक्षित होती है। वास्तव में उनमें कोई भिन्नता नहीं है। यदि यथार्थ में ही भेद हो तो दोनों का चित् स्वरूप ही नष्ट हो जायगा। चित् से चित् का भेद कल्पित किया जाना जड़ रूप उपाधि से ही हुआ है। चिदाकारता से कोई भेद नहीं हो सकता। भेद-दृष्टि ही जड़ता से उत्पन्न होती है। चित्त की एकता युक्ति और प्रमाण दोनों के द्वारा ही परिपुष्ट है। अतः चित् की एकता का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य मोह और शोक से मुक्त हो जाता है और अद्वैत परमानन्द रूप शिवत्व की उसे प्राप्ति होती है। वह चिद्धन स्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का परम आश्रय है। ऋषि- गण परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा मानकर शोक से छूट जाते हैं। जिन मनुष्यों के दोष नष्ट हो गये हैं, वे ही उस सर्वसाक्षी और स्वयंज्योति रूप परब्रह्म के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। माया के जाल में फँसे हुए जीव उसे नहीं देख सकते । जो सिद्ध पुरुष आत्मा के स्वरूप का ऐसा ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे पूर्णता को प्राप्त पुरुष कहीं आते-जाते नहीं। जैसे परिपूर्ण आकाश कहीं जाता नहीं, वैसे ही आत्म-तत्त्व का ज्ञाता महात्मा भी कहीं नहीं जाता। जो उस परमब्रह्म का ज्ञाता है, वह सच्चिदानन्द रूप में स्थित होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ॥ ३८-५१ ॥ ॥ रुद्रहृदयोपनिषत् समाप्त ॥
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गरुडोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुः वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्ता- र्क्ष्यो अरिष्टनेमिः॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें। सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥
हरिः ॐ गारुडब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि यां ब्रह्मा विद्यां नारदाय प्रोवाच नारदो बृहत्सेनाय बृहत्सेन इन्द्राय इन्द्रो भर- द्वाजाय भरद्वाजो जीवत्कामेभ्यः शिष्येभ्यः प्रायच्छत् । अस्याः श्रीमहागरुडब्रह्मविद्याया ब्रह्मा ऋषिः। गायत्री छन्दः। श्रीभग- वान्महागरुडो देवता । श्रीमद्भागुरुडप्रीत्यर्थं मम सकलविषवि- नाशनाथें जपे विनियोगः। ॐ नमो भगवते अंगुष्ठाभ्यां नमः। श्रीमंहागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट् । श्रीविष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम् । त्रैलोक्यपरि- पूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । उग्रभयंकरकालनलरूपाय
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[page-header] गरूड़ोपनिषत् ] [ ४४१ [/page-header]
करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः सुव- रोमिति दिग्बन्धः । हरि ॐ। गरुड़ सम्बन्धी ब्रह्मविद्या का उपदेश किया जाता है, जिस विद्या को ब्रह्मा ने नारद को, नारद ने वृहत्सेन को, वृहत्सेन ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को, भरद्वाज ने जीवत्काम शिष्यों को कहा (उन्हें प्रदान किया) नीचे लिखे विनियोग से जल छोड़ना चाहिये—'अस्या श्री महागरुड़ ब्रह्मविद्याया' --- --- •••विषविनाशार्थे विनियोगः । अब नीचे लिखे मन्त्रों से अङ्गन्यास करना चाहियेः— ॐ नमो--- --- •••अंगुष्ठाभ्यां नमः । श्री महागरुडाय--- •••तर्जनीभ्यां स्वाहा । पक्षीन्द्राय••• ••• ---मध्यमाभ्यां वषट् । श्री विष्णुवल्लभाय••• •••अनामिकाभ्याँहुम् । त्रैलोक्य परिपूजिताय••• •••कनिष्ठिकाभ्यां वोषट् । उग्रभयङ्कर••• --- •••करतल पृष्ठाभ्यां फट् । इसी प्रकार हृदय शिरशिखा कवच नेत्रादि न्यास करके वोषट् करना चाहिये । "भूर्भुवः स्वरोम्" इससे दिग्बन्धन करना चाहिये । ध्यानम् । स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् । प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुड हरिवल्लभम् ॥ १ ॥ अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः । तक्षकः कटिसूत्रं तु हारः कार्कोट उच्यते ॥ २ ॥ पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां सुबीजितम् । एलपुत्रक- नागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम् ॥ ४ ॥ कपिलाक्षं गरुमन्तं सुवर्णसदृशप्रभम् । दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नादाभरणभूषितम् ॥५॥
४४२ ] [ गरुडोपनिषत् आजानुतः सुवर्णाभमाकट्योस्तुहिनप्रभम् । कुंकुमारुणमाकण्ठं शतचन्द्रनिभाननम् ॥ ६ ॥ नीलाग्रनासिकावक्रं सुमहच्चारुकुण्ड- लम् । दंष्ट्राकरालवदनं किरीटमुकुटोज्ज्वलम् ॥ ७ ॥ कुंकुमारुण- सर्वाङ्गं कुन्देन्दुधवलाननम् । विष्णुवाह नमस्तुभ्यं क्षेमं कुरु सदा मम ॥ ८ ॥ निम्न श्लोकों से ध्यान कराना चाहियेः- स्वस्तिको दक्षिणं पादं .. ...हरिवल्लभम् । १ । अनन्तो वामकटको... ...कार्कोट उच्यते । २ । पद्मो दक्षिणकर्णे... ...भुजान्तरे । ३ । पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां... ...मुदान्वितम् । ४ । कपिलाक्षं... - ...नागाभरणभूषितम् । ५ । आजानुतः... ... ...शतचन्द्रनिभाननम् । ६ । नीलाग्रनासिकावक्रं... ...किरीट मुकुटोज्ज्वलम् । ७ । कुङ्कुमारुणसर्वाङ्गं... ...कुरु सदा मम् । ८ । इन सब श्लोकों को गरुड़ का ध्यान करते हुए भली- भाँति श्रद्धापूर्वक पढ़ाना चाहिये । एवं ध्यायेत्त्रिसंध्यासु गरुडं नागभूषणम् । विषं नाशयते शीघ्रं तूलराशिमिवानलः ॥ ६ ॥ ओमीमों नमो भगवते श्रीमहागरुडाय पक्षीन्द्राय विष्णुवल्लभाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय उग्रभयंकरकालानलरूपाय वज्रनखाय वज्रतुण्डाय वज्रदन्ताय वज्रदंष्ट्राय वज्रपुच्छाय वज्रपक्षालक्षिनशरीराय ओमीकेह्य हि श्रोमहागरुडाप्रतिशासनास्मिन्नाविश विश दुष्टानां विषं दूषयदूषय स्पृष्टानां नाशयनाशय दन्दशूकानां विषं दारय दारय प्रलीनं विषं प्रणाशयप्रणाशय सर्वविषं नाशय नाशय हनहन दहदह पचपच भस्मीकुरुभस्मीकुरु हुं
गरुडोपनिषत् ] [ ४४३ फट् स्वाहा ॥ चन्द्रमण्डलसंकाश सूर्यमण्डलमुष्टिक । पृथ्वो- मण्डलमुद्राङ्ग श्रीमद्भागुरुडायविषं हरहंर हुं फट् स्वाहा ॥ ॐ क्षिप स्वाहा ॥ ओमीं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषाणां च विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषणी विषनाशिनी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषमन्त प्रलीन विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते महागुरडाय विष्णुवाहनाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय वज्रन- खवज्रतुण्डाय वज्रपक्षालकृतशरीराय एह्येहि महागुरड विषं छिन्धिच्छिन्धि आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा ॥ सुपर्णोऽसि गरुत्मान्त्रिवृत्ते शिरो गायत्र चक्षुः स्तोम आत्मा साम ते तनूर्वाम- देव्यं बृहद्रथन्तरे पक्षौ यज्ञायज्ञियं पुच्छ छन्दांस्यङ्गानि धिष्ण्या शफा यजूंषि नाम ॥ सुपर्णोसि गरुत्मान्दिव गच्छ सुवः पत ओमीं ब्रह्मविद्याममावास्यायां पौर्णमास्यां पुरोवाच सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनांशिगी विषदूहिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं नष्टं विषं प्रनष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ तस्यम् '? ) । इस प्रकार तीनों सन्ध्याओं के समय नागभूषण गरुड़ का ध्यान करना चाहिये । इनके ध्यान से विष ऐसे समाप्त हो जाता है जैसे आग द्वारा रुई का ढेर । ६ । अब अधोलिखित मन्त्रों का उच्चारण विषनाश करने के लिये करना चाहिये और उस स्थान को झाड़ना चाहिये । इन्हीं मन्त्रों से होम भी सिद्धि प्राप्ति के निमित्त करना चाहियेः— ॐ मी मों नमोः भगवते ॰॰ .... ...भस्मां कुरु भस्मी कुरु हुं फट् स्वाहा । १.। चन्द्रमण्डलसंकाश... ... ...विषं हर हर हुँ फट् स्वाहा ॐ क्षिप स्वाहा । २ ।
४४४ ] [ गरुडोपनिषत्
ओमीं संचरति... ... ...वज्रेण स्वाहा । ३ । ॐ नमो भगवते... ...आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा । ४ । सुपर्णोऽसि गरुत्मांन्... ...विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । ५ । यद्यनन्तदूतोऽसि यदि वानन्तकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । यदि वासुकिदूतोऽसि वा वासुकिः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मकातरी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा यदि वा तक्षकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमि- न्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि कर्कोटकदूतोऽसि यदि वा कर्कोटकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि पद्मकदूतोऽसि यदि वा पद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि महापद्मकदूतोऽसि यदि वा महापद्मकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी त्रिषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि शङ्खकदूतोऽसि यदि वा शङ्खकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मत्कारी विषनाशिनी विषदूषिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥
गरुडोपनिषत् ] [ ४४५ यदि गुलिकदूतोऽसि यदि वा गुलिकः स्वयं सचरति सचरित तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमि- न्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि पौण्ड्रकालिकदूतोऽसि यदि वा पौण्ड्रकालिकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषना- शिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ यदि नागकदूतोऽसि यदि वा नागकः स्वयं सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ॥ तदि लूतानां प्रलूतानां यदि वृश्चिकानां यदि घोटकानां यदि स्थावरजङ्गमानां सचरति सचरति तत्कारी मतकारी विषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । अनन्तवासुकितक्षककर्कोटकपद्मक महापद्मक- शङ्खगुलिकपौण्ड्रकालिकनाग इत्येषां दिव्यानां महानागानां महानागादिरूपाणां विषतुण्डानां विषदन्तानां विषदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विश्वचाराणां वृश्चिकानां लूतानां प्रलूतानां मूषिकाणां गृहगौलिकानां गृहगोधिकानां ध्रणासानां गृहगिरिगह्वरकालानलवल्मोकोद्भूतानां तार्णानां पार्णानां काष्ठ- दारुवृक्षकोटरस्थानां मूलत्वग्दारुनिर्यासपत्रपुष्पफलोद्भूतानां दुष्ट- कीटकपिश्वानमार्जारजम्बुकव्याघ्रवराहाणां जरायुजाण्डजोद्भि- ज्जस्वेदजानां शस्त्रबाणक्षतस्फोटव्रणमहाव्रणकृतानां कृत्रिमाणा- मन्येषां भूतवेतालकूष्माण्डपिशाचप्रेतराक्षसयक्षभयप्रदानां विष- तुण्डदंष्ट्राणां विषाङ्गानां विषपुच्छानां विषाणां विषरूपिणी विषदूषिणी विषशोषिणी विषनाशिनी विषहारिणी हतं विषं
४४६ ] [ गरुडोपनिषत् नष्टं विषमन्तःप्रलीतं विषं प्रनष्टं विषं हतं ते ब्रह्मणा विष- मिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । यद्यनन्तक दूतोऽसि... ... ...ब्रह्मणा... ... वज्रेण स्वाहा । ६ । यदि वासुकिदूतोऽसि... ... ...इन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा ।७। यदि वा तक्षक स्वयं... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि कर्कोटक दूतोऽसि .. ...वज्रेण स्वाहा । यदि पद्मक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि महापद्मक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि शंखक दूतोऽसि... ... - वज्रेण स्वाहा । यदि गुलिक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि पौण्ड्रकालिक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि नागक दूतोऽसि... ... ...वज्रेण स्वाहा । यदि लूतानां प्रलूतानां... ... ...वज्रेण स्वाहा । अनन्त वासुकितक्षक... ... ...विषं हतं ते ब्रह्मणा विष- मिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा । इ इमां ब्रह्मविद्याममावास्यायां पठेच्छृणुयाद्वा यावज्जीवं न हिंसन्ति सर्पाः । अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा तृणेन मोचयेत् । शतं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा चक्षुषा मोचयेत् । सहस्रं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा मनसा मोचयेत् । सर्पञ्जले न मुञ्चन्ति । तृणे न मुञ्चन्ति । काष्ठेन मुञ्चन्ती त्याह भगवान्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
सारे जीवन भर साँप नहीं काटते आठ ब्राह्मणों को ग्रहण करवा कर
गरुडोपनिषत् ] [ ४४७ जो इस ब्रह्मविद्या का अमावस्या के दिन अध्ययन करता है उसे सारे जीवन भर साँप नहीं काटते आठ ब्राह्मणों को ग्रहण करवा कर तिनके से, सौ ब्राह्मणों को बतलाकर आँख से, हजार ब्राह्मणों को बतला कर मन से ही विष को मुक्त किया जा सकता है। सर्पकुण्डली तिनके तथा काठ पर स्थित होने से विषमुक्त नहीं होता। ॥ गरुडोपनिषत् समाप्त ॥
ॐ अस्य श्रीअनन्तघोरप्रलयज्वालाग्निरौद्रस्य वीरहनुम- त्साध्यसाधना घोरमूलमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीरामलक्ष्मणौ देवता । सौं बीजम् । अञ्जनासूनुरिति शक्तिः । वायुपुत्र इति कीलकम् । श्रीहनुमत्प्रसादसिद्धयर्थं भूर्भुवस्स्वर्लो- कसमासीनतत्त्वंपदशोधनार्थं जपे विनियोगः ।
ॐ भूः नमो भगवते दावानलकालाग्निहनुमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । हृदयाय नमः । ॐ भुवः नमो भगवते चण्डप्रतापहनुमते तर्जनीभ्यां नमः । शिरसे स्वाहा । ॐ स्वः नमो भगवते चिन्ता- मणिहनुमते मध्यमाभ्यां नमः । शिखायै वषट् । ॐ महः नमो भगवते पातालगरुडहनुमते अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम् । ॐ जनः नमो भगवते कालाग्निरुद्रहनुमते कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ तपः सत्यं नमो भगवते भद्रजातिविकटरुद्र- वीरहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अस्त्राय फट् । पाशुपतेन दिग्बन्धः । अथ ध्यानम्—
वज्राङ्गं पिङ्ग्नेत्रं कनकमयल्सत्कुण्डलाक्रान्तगण्डं दम्भोलिस्तम्भसारप्रहणविवशीभूतरक्षोऽधिनाथम् । उद्यल्लाङ्गूलघर्षप्रचलजलनिधिं भीमरूपं कपीन्द्रं ध्यायन्तं रामचन्द्रं प्लवगपरिवृढं सत्त्वसारं प्रसन्नम् ॥
नीचे दिए संकल्प से जल छोड़ना चाहिए :— ॐ अस्य... जपे विनियोगः ।
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri लांगूलोपनिषत् ] [ ४४१ अब नीचे दिये क्रम के अनुसार अङ्गन्यास करना चाहिए— (तत्तद् स्थानों को छूना चाहिए) । ॐभूः नमोः... ...अगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः । ॐभुवः नमो... ...तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा । ॐस्वः नमो... ...मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् । ॐमहः... ....अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम् । ॐजनः... ...कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र त्रयाय वषट् । ॐ तपः... ...करतल पृष्ठां भ्यां नमः अस्त्राय फट् । पशुपत के द्वारा दिग्बन्धन करना चाहिये । नीचे दिये श्लोक से ध्यान करना चाहिये ( हाथ जोड़कर आंखें बन्दकर ) । वज्राङ्ग पिङ्गानेत्र... ... ...सत्वसारं प्रसन्नम् । इति मानसोपचारैः सम्पूज्य, ॐनमो भगवते दावासलका- लाग्निहनुमते (जयश्रियो जयजीविताय)धवलीकृतजगतत्रय वज्र- देह वज्रपुच्छ वज्रकाय वध्रतुण्ड वज्रमुख वज्रनख वज्रबाहो वज्ररोम वज्रनेत्र वज्रदन्त वज्रशरीर सकलात्मकाय भीमकर पिङ्गलाक्ष उग्र प्रलयकालरौद्र वीरभद्रावतार शरभसालुवभैरव- दोर्दण्ड लङ्कापुरीदाहन उदधिलङ्घन दशग्रीवकृतान्त सीता- विश्वास ईश्वरपुत्र अञ्जनागर्भसम्भूत उदयभास्करबिम्बानलग्रासक देवदानवर्षिमुनिवन्द्य पाशुपतास्त्रब्रह्मास्त्रबैलनारायणास्त्र- कालशक्तिकास्त्रदण्डकास्त्रपाशाघोरास्त्रनिवारण पाशुपतास्त्रब्रह्मा- स्त्रबैलवाखनारायणास्त्रमृड सर्वशक्तिग्रसन ममात्मरक्षाकर परविद्यानिवारण आत्मविद्यासंरक्षक अग्निदीप्त अथर्वणवेदसिद्ध- स्थिरकालाग्निनिराहारक वायुवेग मनोवेग श्रीरामतारकपरब्रह्म- विश्वरूपदर्शक लक्ष्मणप्राणप्रतिष्ठामन्दकार स्थलजलाग्निमर्मभेदिन्
४५० ] [ लांगूलोपनिषत् सर्वशत्रून् छिन्धि छिन्धि मम वैरिणः खादय खादय मम सज्जीवन- पर्वतोत्पाटन डाकिनीविध्वंसन सुग्रीवसख्यकरण निष्कलङ्क कुमारब्रह्मचारिन् दिगम्बर सर्वपाप सर्वग्रह कुमारग्रह सर्वं छेदय छेदय भेदय भेदय भिन्धि भिन्धि खादय खादय टङ्क टङ्क ताडय ताडय मारय मारय शोषय शोषय ज्वालय ज्वालय हारण हार देवदत्तं नाशय नाशय अतिशोषय अतिशोषय मम सर्वं च हनुमन् रक्ष रक्ष ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हुं फट् घे घे स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते चण्डप्रतापहनुमते महावीराय सर्वदुःख- विनाशनाय ग्रहमण्डलभूतमण्डल प्रेतपिशाचमण्डलसर्वोच्चाटनाय अतिभयङ्करज्वरमाहेश्वरज्वर--विष्णुज्वर--ब्रह्मज्वर--वेताल ब्रह्म- राक्षसज्वर--पित्तज्वर-श्लेष्मसान्निपातिकज्वर--विषमज्वर--शीत- ज्वर--एकाहिकज्वर--द्वयाहिकज्वर--त्र्यं हिकज्वर--चातुर्थिकज्वर-- अर्धमासिकज्वर--मासिकज्वर--षाण्मासिकज्वर--सांवत्सरिकज्वर- अस्थ्यन्तर्गतज्वर-महापस्मार--भ्रमिकापस्मारांश्च भेदय भेदय खादय खादय ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हुं फट् घे घे स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते चिन्तामणिहनुमते अङ्गशूल-अक्षिशूल- शिरश्शूल-गुल्मशूल-उदरशूल-कर्णशूल--नेत्रशूल-गुदशूल--कटिशूल जानुशूल-जघ्ड़ाशूल-हस्तशूल-पादशूल-गुल्फशूल--वातशूल-पित्त- शूल-पायुशूल--स्तनशूल-परिणामशूल-परिधामशूल--परिवाणशूल- दन्तशूल-कुक्षिशूल-सुमनश्शूल-सर्वशूलानि निर्मूलय निर्मूलय दंत्यदानवकामिनीवेताल ब्रह्मराक्षसकोलाहलनागपाशनन्तवासुकि- तक्षकार्को--टकलिङ्गपद्मककुमुदज्वल रोगपाशमहामारीन् कालपा- शविषं निर्विषं कुरु कुरु ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हुं फट् घे घे स्वाहा ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लां ग्लिं ग्लूं ॐ नमो भगवते पाताल- गहडहनुमते भैरवचनमलगजर्सिहेन्द्राक्षीपाशबन्धनान् छेदय छेदय
लांगूलोपनिषत् ] [ ४५१ प्रलयमारुत कालाग्निहनुमन् श्रृंखलाबन्धं विमोक्षय विमोक्षय सर्वग्रहं छेदय छेदय मम सर्वकार्याणि साधय साधय मम प्रसादं कुरु कुरु मम प्रसन्न श्रीरामसेवकसिंह भैरवस्वरूप मां रक्ष रक्ष ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रां ह्रीं क्ष्मौं फ्रें श्रां श्रीं क्लां क्लीं क्रां क्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूँ ह्रैं ह्रौ ह्रः ह्रां ह्रीं हुं ख ख जय जय मारण मोहन घूर्ग घूर्ण दम दम मारय मारय वारय वारय खे खे ह्रां ह्रीं ह्रूँ हुं फट् घे घे स्वाहा ॥ ॐ नमो भगवते कालाग्निरौद्रहनुमते भ्रामय भ्रामय लव लव कुरु कुरु जय जय हस हस मादय मादय प्रज्वलय मृडय मृडय त्रासय त्रासय साहय साहय वशय वशय शामय शामय अस्त्रत्रिशूलडमरुखङ्गकालमृत्युकपालखट् वांगधर अभयशाश्वत हुँ हुँ अवतारय अवतारय हुँ हुँ अनन्तभूषण परमन्त्र-परयन्त्र शतसहस्र कोटितेज पुञ्जं भेदय भेदय अग्नि बन्धय लन्घय वायुं बन्धय वन्धय सर्वग्रह बन्धय बन्धय अनन्तापिदुष्टनागानां द्वादशकुलवृ- श्चिचकानामेकानशलूतानां विषं हन हन सर्वविषं बन्धय बन्धय बन्धय वज्रतुण्ड उटुचाटय मारणमोहनवशीकरणस्तम्भनजृम्भणाक- र्षणोच्चाटनमिलनविद्वेषणयुद्धतकंमर्माणि बन्धय बन्धय ॐ कुमा- रीपदत्रिहारबाणोग्रमूर्तये ग्रामवासिने अतिपूर्वशक्ताय सर्वायुधध- राय स्वाहा अक्षयाय घे घे घे घे ॐ लं लं लं घ्रां घ्रौं स्वाहा ॐ हलां हलीं हलूं हुँ फट् घे घे स्वाहा ॥ ॐश्रां श्रीं श्रूँ श्रैं श्रौं श्रः ॐनमो भगवते भवगते भद्रंजानिकट- रुद्रवीरहनुमते टं टं टं लं लं लं वेवदत्तदिगम्बरराष्ट्रमहाशक्त्यष्टा- ङ्गधर अष्टमहाभैरवनवब्रह्मस्वरूप दशविष्णुरूप एकदशरुद्रावतार द्वादशार्कतेजः त्रयोदशसोममुख वीरहनुमन् स्तम्भिनीमोहनीवशी- करणीतन्त्रोक्तसावयव नगरराजमुखबन्धन बलमुखमकरमुखसिंह-
मुखजिह्वामुखानि बन्धय बन्धय स्तम्भय स्तम्भय व्याघ्रमुखसर्व- वृश्चिकाग्निज्यालाविषं निर्गमय निर्गमय सर्वजनवैरिमुखं बन्धय बन्धय पापहर वीर हनुमन् ईश्वरावतार वायुनन्दन अञ्जनासुत बन्धय बन्धय श्रीरामचन्द्रसेवक ॐ ह्वां ह्वां ह्वां आसय सासय ह्रीं ह्लां ग्रीं क्रीं यं भें भ्रं भ्रः हट् हट् खट् खट् सर्वजन-विश्वजन- शत्रुजन-वश्यजन-सर्वजनस्य दृशं लं लां श्रीं ह्वां ह्रीं मनः स्तम्भय स्तम्भय भञ्जय भञ्जय अद्रि ह्रीं व हीं हीं मे सर्व हीं हीं सागरहीं हीं वं वं सर्वमन्त्रार्थार्थर्वणवेदसिद्धि कुरु कुरु स्वाहा। श्रीरामचन्द्र उवाच। श्रीमहादेव उवाच। श्रीवीरभद्रस्तौ उवाच। त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
इस प्रकार मानसिक पूजा करके अधोलिखित मन्त्रों का उच्चा- करना चाहिये। इनसे हवन (होम) करना है। ॐ नमो भगवते दावानल कालाग्नि हनुमते ・・・ ・・・हनुमन् रक्ष- रक्ष ॐ ह्वां ह्रीं हूं हूं फट् घे घे स्वाहा ॥१॥ ॐ नमो भगवते चण्डप्रताप हनुमते・・・ ・・・खादय खादय ॐ ह्वां ह्रीं हूं हूं फट् घे घे स्वाहा ॥२॥ ॐ नमो भगवते चिन्तामणि हनुमते・・・ ・・・निर्विषं कुरु कुरु घे घे स्वाहा ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ग्लां ग्लिं ग्लूं ॐ नमो भगवते पाताल गरुड हनुमते・・・ ・・・वारय वारय ・・・ ・・・घे घे स्वाहा ॥४॥ ॐ नमो भगवते कालाग्निरुद्र हनुमते・・・ ・・・घ्रां घ्रों स्वाहा हुं फट् घे घे स्वाहा ॥५॥ ॐ श्रीं श्रीं ・・・ ॐ नमो भगवते भद्रजानिकटरुद्र-
लांगूलोपनिषत् ] [ ४५३ वीर हनुमते... ... ...हीं हीं सागर ह्रीं ह्रीं वं वं सर्वं, मन्त्रार्थायवंच वेदसिद्धि कुरु कुरु स्वाहा ॥६॥ इस प्रकार श्री रामचन्द्र तथा शिवने वीरभद्र को तथा वीरभद्र ने उन दोनों को कहा । इस सारे विधि विधान को पूछा समझा आदि । इसे जो तीनों प्रातः मध्याह्न एवं सायं सन्ध्या के समय पढ़ता है उसको वे सभी वस्तुयें प्राप्त हो जाया करती हैं जो कि ऊपर लिखे मन्त्रों में निर्दिष्ट हैं । ॥ लांगूलोपनिषद् समाप्त ॥
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गायत्री रहस्योपनिष
ॐ स्वस्ति सिद्धम् । ॐ नमो ब्रह्मणे । ॐ नमस्कृत्य याज्ञ- वल्क्यः ऋषिः स्वयंभुवं परिपृच्छति । हे ब्रह्मन् गायत्र्या उत्पत्ति श्रोतुमिच्छामि । अथातो वसिष्ठ स्वयंभुवं परिपृच्छति । यो ब्रह्मा स ब्रह्मोवाच । ब्रह्मज्ञानोत्पत्तेः प्रकृतिं व्याख्यास्यामः । को नाम स्वयंभू पुरुष इति । तेनाङ्गुलीमथ्यमानात् सलिल- मभवत् । सलिलात् फेनमभवत् । फेनाद्बुद्बुदमभवत् । बुद्बुदा- दण्डमभवत् । अण्डाद्ब्रह्माभवत् । ब्रह्मणो वायुरभवत् । वायो- रग्निरभवत् । अग्नेरोङ्कारोऽभवत् । ओंकाराद्व्याहृतिरभवत् । व्याहृत्याः गायत्र्यभवत् । गायत्र्याः सावित्र्यभवत् । सावित्र्याः सरस्वत्यभवत् । सरस्वत्याः सर्वे वेदा अभवन् । सर्वेभ्यो वेदेभ्यः सर्वे लोका अभवन् । सर्वेभ्यो लोकेभ्यः सर्वे प्राणिनोऽभवन् ।
ॐ स्वस्ति (कल्याण, हो) ; सबको ; सिद्धि प्राप्त हो । ब्रह्म को नमस्कार हो । इस प्रकार प्रमाण कर याज्ञवल्क्य स्वयंभुव से पूछते हैं—गायत्री की उत्पत्ति किस प्रकार है ? वह बोले--ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति की प्रकृति के आदि कारण की व्याख्या की जाती है । कौन स्वयम्भू है ? वही पुराण पुरुष । उसने अँगुली का मन्थन करते हुए जल को उत्पन्न किया (उससे जल उत्पन्न) हुआ। जल से फेन, फेन से बुद्बुद बुद्बुद से अण्डा, अण्डे से ब्रह्मा, ब्रह्मा से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से ॐकार, ॐकार से व्याहृति, व्याहृति से गायत्री, गायत्री, से सावित्री, सावित्री से सरस्वती, सरस्वती, से सभी वेद, स। वेदों से सारे लोक और अन्त में सब लोकों से सारे प्राणी उत्पन्न हुए ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi