भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 572 में से

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गायत्री रहस्योपनिष

ॐ स्वस्ति सिद्धम् । ॐ नमो ब्रह्मणे । ॐ नमस्कृत्य याज्ञ- वल्क्यः ऋषिः स्वयंभुवं परिपृच्छति । हे ब्रह्मन् गायत्र्या उत्पत्ति श्रोतुमिच्छामि । अथातो वसिष्ठ स्वयंभुवं परिपृच्छति । यो ब्रह्मा स ब्रह्मोवाच । ब्रह्मज्ञानोत्पत्तेः प्रकृतिं व्याख्यास्यामः । को नाम स्वयंभू पुरुष इति । तेनाङ्गुलीमथ्यमानात् सलिल- मभवत् । सलिलात् फेनमभवत् । फेनाद्बुद्बुदमभवत् । बुद्बुदा- दण्डमभवत् । अण्डाद्ब्रह्माभवत् । ब्रह्मणो वायुरभवत् । वायो- रग्निरभवत् । अग्नेरोङ्कारोऽभवत् । ओंकाराद्व्याहृतिरभवत् । व्याहृत्याः गायत्र्यभवत् । गायत्र्याः सावित्र्यभवत् । सावित्र्याः सरस्वत्यभवत् । सरस्वत्याः सर्वे वेदा अभवन् । सर्वेभ्यो वेदेभ्यः सर्वे लोका अभवन् । सर्वेभ्यो लोकेभ्यः सर्वे प्राणिनोऽभवन् ।

ॐ स्वस्ति (कल्याण, हो) ; सबको ; सिद्धि प्राप्त हो । ब्रह्म को नमस्कार हो । इस प्रकार प्रमाण कर याज्ञवल्क्य स्वयंभुव से पूछते हैं—गायत्री की उत्पत्ति किस प्रकार है ? वह बोले--ब्रह्मज्ञान की उत्पत्ति की प्रकृति के आदि कारण की व्याख्या की जाती है । कौन स्वयम्भू है ? वही पुराण पुरुष । उसने अँगुली का मन्थन करते हुए जल को उत्पन्न किया (उससे जल उत्पन्न) हुआ। जल से फेन, फेन से बुद्बुद बुद्बुद से अण्डा, अण्डे से ब्रह्मा, ब्रह्मा से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से ॐकार, ॐकार से व्याहृति, व्याहृति से गायत्री, गायत्री, से सावित्री, सावित्री से सरस्वती, सरस्वती, से सभी वेद, स। वेदों से सारे लोक और अन्त में सब लोकों से सारे प्राणी उत्पन्न हुए ।

Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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