भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४३६ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् घटाकाशमठाकाशौ यथाऽऽकाशप्रभेदतः । कल्पितौ परमो जीव शिव रूपेण कल्पितौ ॥४३ तत्त्वतश्च शिवः साक्षाच्चिज्जीवश्च स्वतः सदा । चिच्चिदाकारतो भिन्ना न भिन्ना चित्त्वहानितः ॥४४ चितश्चिन्न चिदाकाराद्भिद्यते जडरूपतः । भिद्यते केज्जडो भेदश्चिदेका सर्वदा खलु ॥४५ तर्कतश्च प्रमाणाच्च चिदेजत्वव्यवस्थितेः । चिदेकत्वपरिज्ञाने न शोचति न मुह्यति । अद्वैतं परमानन्दं शिवं याति तु केवलम् ॥४६ अधिष्ठानं समस्तस्य जगतः सत्यचिद्धनम् । अहमस्मीति निश्चित्य वीतशोको भवेन्मुनि ॥४७ स्वशरीरे स्वयं ज्योतिस्स्वरूपं सर्वसाक्षिणम् । क्षीणादोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः ॥४८ एवंरूपपरिज्ञान यस्यास्ति परयोगिनः । कुत्रचिद्गमनं नास्ति तस्य पूर्णस्वरूपिणः ॥४६ आकाशमेकं सम्पूर्णं कुत्र चिन्नैव गच्छति । तद्वत्स्वात्म परिज्ञानी कुत्र चिन्नैव गच्छति ॥५० स तो॒ ह वै॒ तत्पर॑मंब्रह्म॒यो वेदं॒ वै मुनिः॑ । ब्रह्म॑ वै भवति स्वस्थः सच्चिदानन्दमातृकः ॥५१ : ब्रह्म रूप लक्ष्य के लिए प्रणव धनुष रूप और आत्मा बाण के समान है । उसे बींधने के लिए आलस्य का त्याग आवश्यकीय कार्य है । उस ब्रह्म में उसी प्रकार तन्मय हो जाना चाहिए जैसे लक्ष्य की बींधने के लिए बाण क्रियारत होता है । ब्रह्म रूप लक्ष्य सर्वगत है, आत्मा सर्वतोमुख है, परन्तु यदि साधक भी सर्वगत हो तो शिवःरूप लक्ष्य की प्राप्ति निःसन्देह होती है । जिन परमात्मा के परमधाम में चन्द्र-सूर्य नहीं होते, जहाँ वायु तथा अन्य देवगण भी पहुंच नहीं पातें, वहीं पर-

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