भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 445

रुद्रहृदयोपनिषत् ] [ ४३७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ब्रह्म से ही भोक्ता एवं अन्य-रूप युक्त यह विश्व प्रकट होता है । वह ब्रह्म सर्वज्ञ एवं सब विद्याओं का आश्रयस्थान है। उसका तप ज्ञान ही है। सत्य के समान दिखाई पड़ने वाला यह विश्व रस्सी में सर्प के आभास के समान ही ब्रह्म में स्थित है। यह विश्व असत्य है, परन्तु ब्रह्म अविनाशी एवं सत्य है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। कर्म से संसार की पाश नहीं कटती, वह तो ज्ञान से ही छिन्न-भिन्न होती है। इसलिए मुक्ति-काम्य पुरुष को अपने ब्रह्मनिष्ठ एवं श्रोत्रिय गुरु की शरण लेनी चाहिए। वह गुरु उसे आत्मा और ब्रह्म के एक होने का ज्ञान कराने वाली परविद्या सिखावे। गुहा में अलक्षित उस अविनाशी ब्रह्म से जो पुरुष साक्षात् कर लेता है, उसके अविद्या रूपी बन्धन तो कट जाते हैं और फिर वह पुराण पुरुष शिव के समीप जाता है। अमृतरूप सत्य मोक्ष की कामना वाले साधकों के लिए ज्ञातव्य है। धनुस्तारं शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्य मुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥३८ लक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः सर्वगतो मुखः । वेद्धा सर्वगतश्चैव शिवलक्ष्यं न संशयः ॥३९ न तत्र चन्द्रार्कवपुः प्रकाशते न वान्ति तावाः सकला देवताश्च । स एष देवः कृतभावभूतः रूपं विशुद्धो विरजाः प्रकाशते ॥४० द्वौ सुपर्णौ शरीरेऽस्मिन् जीवेशाख्यौ सह स्थितौ । तयोर्जीवः फलं भुङ्क्ते कर्मणो न महेश्वरः ॥४१ केवलं साक्षिरूपेण विना भोगं महेश्वरः । प्रकाशते स्वयं भेदः कल्पितो मायया तयोः ॥४२ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi