भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४३२ ] [ रुद्रहृदयोपनिषत् ज्ञान से सम्बन्धित अग्निहोत्र के पञ्च महामन्त्र कहा गया है तथा यही श्रुति के पंच महावाक्य माने गए हैं । एक बार श्री शुकदेवजी ने अपने पिता महाज्ञानी व्यासजी महा- राज के चरणों में शीश झुकाकर निवेदन किया—'प्रभो ! सब वेदों ने किस देव का प्रतिपादन किया है और समस्त देवताओं का वास किस देव में है, यह कृपा कर मेरे प्रति कहिये और यह भी बताइये किस देवता की उपासना करने से सभी देवता मुझ पर प्रसन्न होंगे ?' ऐसा प्रश्न सुनकर तत्वज्ञानी व्यासजी ने कहा—हे पुत्र ! भगवान् रुद्र में सब देवता निवास करते हैं । रुद्र भगवान् के दक्षिण पार्श्व में सूर्य, ब्रह्मा एवं गार्ह- पत्य, दक्षिणादि तीनों अग्नियों की स्थिति है । वाम पार्श्व में उमा, विष्णु और सोम स्थित हैं । इन तीनों में भी कोई भेद नहीं है । क्योंकि उमा ही विष्णु भगवान् हैं और विष्णु ही सोम हैं । जो गोविन्द को नमस्कार करते हैं, उनका नमस्कार भगवान् शंकर को स्वयं ही पहुँच जाता है । जो भक्त भगवान् विष्णु की पूजा करते हैं वे मानों वृषभध्वज की ही पूजा करते हैं ॥ १—५ ॥ ये द्विषन्ति विरूपाक्षं ते द्विषन्ति जनार्दनम् । ये रुद्रं नाभिजानन्ति ते न जानन्ति केशवम् ॥६ रुद्रात् प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः । यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्म यो ब्रह्मा स हुताशनः ॥७ ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत् । पुंलिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं भगवत्युमा ॥८ उमारुद्रात्मिकाः सर्वाः प्रजाः स्थावरजङ्गमाः । व्यक्तं सर्वमुमारूपमव्यक्तं तु महेश्वरम् ॥९ उमाशंकरयोर्योगः य योगो विष्णुरुच्यते । यस्तु तस्मै नमस्कारं कुर्याद्भक्तिसमन्वितः ॥१०