भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 572 में से

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रुद्रहृदयोपनिषत् [ ४३३ जो भगवान् आशुतोष से द्वेष करने वाले हैं, वे जनार्दन प्रभु के प्रिय कभी नहीं हो सकते। जो रुद्र के ज्ञाता नहीं हैं, वे केशव के भी ज्ञाता नहीं हो सकते। क्योंकि रुद्र ही जीव के उत्पन्नकर्त्ता हैं और बीज की योनि रूप भगवान् विष्णु है। रुद्र ही ब्रह्मा है, ब्रह्मा ही अग्नि हैं। रुद्र ही ब्रह्मा और विष्णु रूप हैं। यह अग्नि और सोम से सम्बन्धित विश्व भी रुद्र ही है। सृष्टि में जितने प्राणी पुंल्लिंग रूप से हैं, वे सभी रुद्र हैं तथा स्त्रीलिंगात्मक समस्त देहधारी हैं वे उमा हैं। इस प्रकार जङ्गम रूप यह सम्पूर्ण सृष्टि रुद्र और उमा रूप है। अव्यक्त ससार रुद्र का रूप और व्यक्त ससार भगवती का उमा रूप है। उमा और शङ्कर दोनों के मिलने से विष्णु कहे जाते हैं। जो विष्णु को नमस्कार करते हैं वे त्रिविधात्मा के ज्ञाता होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाते हैं ॥६-१०॥ आत्मानं परमात्मानमन्तरात्मानमेव च । ज्ञाता त्रिविधमात्मानं परमात्मानमाश्रयेत् ॥११ अन्तरात्मा भवेद्ब्रह्मा परमात्मा महेश्वरः । सर्वेषामेव भूतानां विष्णुरात्मा सनातनः ॥१२ अस्य त्रैलोक्यवृक्षस्य भूमौ विटपशाखिनः । अग्रं मध्यं तथा मूलं विष्णुब्रह्ममहेश्वराः ॥१३ कार्यं विष्णुः क्रिया ब्रह्मा कारणं तु महेश्वरः । प्रयोजनार्थं रुद्रेण मूर्तिरेका त्रिधा कृता ॥१४ धर्मो रुद्रो जगद्विष्णुः सर्वज्ञानं पितामहः ॥१५ श्रीरुद्र रुद्र रुद्रेति यस्तं ब्रूयाद्विचक्षणः । कीर्तनात् सर्वदेवस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१६ सब प्राणियों के आत्मा विष्णु हैं, अन्तरात्मा ब्रह्मा और परमात्मा रुद्र हैं। इस लोकत्रय रूप वृक्ष की शाखायें पृथ्वी पर फैली हुई हैं, इसके अग्र भाग विष्णु, क्रिया रूप ब्रह्मा और मूल भाग रुद्र हैं।

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