भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४२८ ] [ नीलरुद्रोपनिषद् हे अधिक लाल वर्ण वाले नीलकण्ठेश्वर ! हमने आपको पृथिवी पर अवतीर्ण होते हुए देखा है। आपकी उस अवतार रूप अवस्था के देखने वाले गोप और गोपियां हैं। आपका स्वरूप गोपियों के लिए भी दिखाई देना कठिन है, परन्तु उसके अवतीर्ण होने पर विश्व के सभी प्राणियों ने दर्शन किये। आपके उस कृष्णस्वरूप को हमारा नमस्कार। हे मोरमुकुट धारी प्रभो ! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप ही महान् शक्ति वाले इन्द्र हैं। अपने भक्तों के समक्ष आप सहस्राक्ष विराट् रूप में भी दर्शन देते हैं। आपके इस रूप के जो सहचर, बाल-गोपाल गोपिकाएं आदि हैं, वे भी हमारे नमस्कार के पात्र हैं। हे प्रभो ! आपके अत्यन्त शक्तिशाली उन आयुधों को भी अने- कानेक नमस्कार हैं, जो इस समय शान्त रूप में स्थित हैं। मैं आपके धनुष को करबद्ध प्रणाम करता हूँ। अब आप अपने धनुष की प्रत्यंचा को शत्रु के लिए भी प्रयुक्त मत कीजिये। आप अपने बाण को हाथ से उतार कर तूणीरस्थ करके अपने परम कल्याणमय एवं सौम्य शिव रूप का मुझे दर्शन करावें। हे सहस्राक्ष ! आप सौ-सौ बाणों का एक साथ संधान करने वाले हैं। आप अपने बाणों के मुखों को तीक्ष्ण कर हमारे कल्याणार्थ उन्हें धनुष पर चढ़ावें। शत्रु-नाश के पश्चात् आपके धनुष से प्रत्यंचार उतर जाय और आपके बाण संताप देना त्याग कर शान्तिपूर्वक तूणीर में निवास करें। वे पर्वतों को चूर्ण कर देने वाले बाण कल्याणकारी हो जांय। आपका शर-संधान हमारी चारों ओर से रक्षा करें। रक्षा करने के पश्चात् उस बाण को आप तूणीर में स्थित कर दें। हे कृपा-वर्षक प्रभो ! आप अपने अमोघ बाण और धनुष के द्वारा चारों ओर से हमारे रक्षक हों। जो सर्प पृथिवी पर वास करते हैं, उन्हें हमारा नमस्कार। आकाश और स्वर्ग में रहने वाले सर्पों को भी नमस्कार सूर्य की रश्मियों, प्रकाश-