भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नीलरुद्रोपनिषत् [ ४२६ ] मय लोकों और जलों में निवास करने वाले सब सर्पों को नमस्कार । जो सर्प राक्षसों के बाण रूप हैं, गड्ढों में रहते हैं तथा वनस्पतियों में निवास करते हैं, उन सर्पों को नमस्कार ॥ २ ॥ तृतीयः खण्डः यः स्वजनाञ्छीलग्रीवो वः स्वजनान्हरिः । कल्माषपुच्छमोषधे जम्भयोताश्वरुन्धति ॥ वभ्रुश्च बभ्रु कर्णश्च नीलग्रीवश्च यः शिवः । शर्वेण नीलकण्ठेन भवेन मरुतां पिता ॥ विरूपाक्षेण बभ्रु णा वाचं वदिष्यतो हतः । शर्वं नीलशिखण्ड वीर कर्मणि कर्मणि ॥ इमामस्य प्राशं जहि येनेदं विभजामहे । नमो भवाय । नमश्शर्वाय । नमः कुमाराय शत्रवे । नमः सभाप्रपादिने । यस्याश्वतरौ द्विसरौ गर्दभावभितस्सरौ । तस्मै नीलशिखण्डाय नमः । नीलशिखण्डाय नमः ॥ ३ ॥ हे औषधियो ! जो भगवान् शिव विश्व के कल्याण के लिए विष- पान कर नीलकण्ठ हो जाते हैं, तथा जो अपने भक्तों का मङ्गल करने के लिए हरि रूप धारण करते हैं, उन कली पूँछ वाले केदारेश्वर प्रभु के लिए अमोघ शक्ति वाली होकर उन्हें सन्तुष्ट करो । भगवान् शिव पिंगलवर्ण देह और कानों वाले हैं, वही नीलकण्ठ वाले सर्व स्वरूप और सर्व व्यापक हैं । उन्हीं विरूपाक्ष भव के द्वारा वाणी के जनक और देवताओं का ही नहीं सम्पूर्ण प्राणियों के पिता ब्रह्माजी का संहार हुआ । प्रत्येक कर्म में उन्हें ही व्यापक रूप से देखो और उनके सम्बन्ध में शङ्का का परित्याग करो । इस विश्व को जिस शङ्का द्वारा हम उनसे पृथक मान लेते हैं, वह शंका सर्वथा त्याज्य है ।