भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 572 में से

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चारकोण वाली पृथ्वी वज्र-लंछिता है ॥ १३४ ॥ पांच घड़ी तक वायु को धारण करके पृथ्वी का ध्यान करना चाहिये। घुटनों से कमर तक जल का स्थान कहा है ॥ १३५ ॥ इस जल स्थान का आकार आधे चन्द्रमा के समान है, वर्ण श्वेत है तथा चांदी से लांछित है। इसमें दस घड़ी तक श्वाँस रोककर जल का ध्यान करे ॥ १३६ ॥ कटि से देह के मध्य अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रङ्ग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि का ध्यान करना चाहिये। नाभि से नासिका तक वायु का स्थान है, जिसका आकार वेदी के तुल्य है, धूम्रवत्, शक्तिशाली पवन का ध्यान बीस घड़ी तक कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर करना चाहिये । नासिका से ब्रह्मरन्ध्र तक आकाश स्थान है जिसकी नीले रंग की प्रभा है ॥ १३६-१४० ॥

व्योम्नि मारुतमारोप्य कुम्भकेनैव यत्नवान् । पृथिव्यंशे तु देहस्य चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१४१ अनिरुद्धं हरिं योगी यतेत भवमुक्तये । अबंशे पूरयेद्योगी नारायणमुदग्रधीः ॥१४२ प्रद्युम्नमग्नौ वाय्वंशे संकर्षणमतः परम् । व्योमांशे परमात्मानं वासुदेवं सदा स्मरेत् ॥१४३ अचिरादेव तत्प्राप्तिर्युञ्जानस्य न संशयः । बद्ध्वा योगासनं पूर्वं हृद्देशे हृदयाञ्जलिः ॥१४४ नासाग्रन्यस्तनयनो जिह्वां कृत्वा च तालुनि । दन्तैर्दन्तानसंस्पृश्य ऊर्ध्वकायः समाहितः ॥१४५ संयमेच्चेन्द्रियग्राममात्मबुद्ध्या विशुद्धया । चिन्तनं वासुदेवस्य परस्य परमात्मनः ॥१४६ प्रयत्नशील साधक कुम्भक द्वारा वायु को आकाश में रोके। फिर पृथ्वी अंश वाले भाग में चतुर्भुज किरीटधारी अनिरुद्ध हरि का

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