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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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चारकोण वाली पृथ्वी वज्र-लंछिता है ॥ १३४ ॥ पांच घड़ी तक वायु को धारण करके पृथ्वी का ध्यान करना चाहिये। घुटनों से कमर तक जल का स्थान कहा है ॥ १३५ ॥ इस जल स्थान का आकार आधे चन्द्रमा के समान है, वर्ण श्वेत है तथा चांदी से लांछित है। इसमें दस घड़ी तक श्वाँस रोककर जल का ध्यान करे ॥ १३६ ॥ कटि से देह के मध्य अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रङ्ग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोककर अग्नि का ध्यान करना चाहिये। नाभि से नासिका तक वायु का स्थान है, जिसका आकार वेदी के तुल्य है, धूम्रवत्, शक्तिशाली पवन का ध्यान बीस घड़ी तक कुम्भक द्वारा वायु को रोक कर करना चाहिये । नासिका से ब्रह्मरन्ध्र तक आकाश स्थान है जिसकी नीले रंग की प्रभा है ॥ १३६-१४० ॥

व्योम्नि मारुतमारोप्य कुम्भकेनैव यत्नवान् । पृथिव्यंशे तु देहस्य चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१४१ अनिरुद्धं हरिं योगी यतेत भवमुक्तये । अबंशे पूरयेद्योगी नारायणमुदग्रधीः ॥१४२ प्रद्युम्नमग्नौ वाय्वंशे संकर्षणमतः परम् । व्योमांशे परमात्मानं वासुदेवं सदा स्मरेत् ॥१४३ अचिरादेव तत्प्राप्तिर्युञ्जानस्य न संशयः । बद्ध्वा योगासनं पूर्वं हृद्देशे हृदयाञ्जलिः ॥१४४ नासाग्रन्यस्तनयनो जिह्वां कृत्वा च तालुनि । दन्तैर्दन्तानसंस्पृश्य ऊर्ध्वकायः समाहितः ॥१४५ संयमेच्चेन्द्रियग्राममात्मबुद्ध्या विशुद्धया । चिन्तनं वासुदेवस्य परस्य परमात्मनः ॥१४६ प्रयत्नशील साधक कुम्भक द्वारा वायु को आकाश में रोके। फिर पृथ्वी अंश वाले भाग में चतुर्भुज किरीटधारी अनिरुद्ध हरि का

२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१२ ] [त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ध्यान करे, जिससे योगी मुक्ति को प्राप्त करने में समर्थ होता है। जल वाले अंश में नारायण का ध्यान करे, अग्नि के अंश में प्रद्युम्न का, वायु-अंश में संकर्षण का और आकाश वाले अंश में परमात्मा वासुदेव का ध्यान करे ॥ १४१-१४३ ॥ जो सदैव इस अभ्यास को करता रहता है उसको परमात्मा का साक्षात्कार शीघ्र ही हो जाता है। पहले योगासन पर बैठकर हृदय-प्रदेश में हृदय को स्थिति करते हुये नासाग्र पर दृष्टि को स्थिर करे, जिह्वा को तालु में लगावे, ऊपर और नीचे के दांतों का स्पर्श न होने दे, शरीर को ऊँचा करके समाहित होकर बैठे और शुद्ध आत्मबुद्धि से इन्द्रियों का संयम करता हुआ भगवान् वासुदेव का चिन्तन करे ॥ १४४-१४६ ॥ स्वरूपव्याप्तरूपस्य ध्यानं कैवल्यसिद्धिदम् । याममात्रं वासुदेवं चिन्तयेत्कुम्भकेन यः ॥१४७ सप्तजन्मार्जितं पापं तस्य नश्यति योगिनः । नाभिकन्दात्समारभ्य यावद्धृदयगोचरम् ॥१४८ जाग्रद्वृत्तिं विजानीयात्कण्ठस्थं स्वप्नवर्तनम् । सुषुप्तं तालुमध्यस्थं तुर्यं भ्रूमध्यसंस्थितम् ॥१४६ तुर्यातीतं परं ब्रह्म ब्रह्मरन्ध्रे तु लक्षयेत् । जाग्रद्वृत्तिं समारभ्य यावद्ब्रह्मबिलान्तरम् ॥१५० तत्रात्माऽयं तुरीयः स्यात् तुर्यान्ते विष्णुरुच्यते । ध्यानेनैव समायुक्तो व्योम्नि चात्यन्तनिर्मले ॥१५१ सूर्यकोटिद्युतिधरं नित्योदितमधोक्षजम् । हृदयाम्बुरुहासीनं ध्यायेद्वा विश्वरूपिणम् ॥१५२ इस प्रकार अपने भीतर व्याप्त परमात्मा के स्वरूप का ध्यान करने से कैवल्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार एक प्रहर तक

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २१३ कुम्भक करते हुए जो भगवान वासुदेव का ध्यान करता है, उसके सात जन्म के पाप विनष्ट हो जाते हैं। नाभिकन्द से लेकर हृदय-प्रदेश तक जाग्रत वृत्ति का स्थान है, स्वप्न वृत्ति कण्ठ में रहती है, सुषुप्ति तालु के मध्य में और तुरीय भ्रुकुटियों के मध्य में स्थित है ॥ १४७-१४६ ॥ तुर्यातीत का स्थान ब्रह्मरन्ध्र में परब्रह्म की ओर होता है। जागृत वृत्ति से लगाकर ब्रह्मरन्ध्र तक तुरीय का आत्मा रहता है। उसके पश्चात् वह विष्णु कहलाता है। तब साधक अत्यन्त निर्मल आकाश में हृदय-कमल पर आसीन करोड़ों सूर्यं के समान प्रभा वाले नित्य उदयरूपी विश्वरूप विष्णु का ध्यान करे ॥ १५०--१५२ ॥ अनेकाकारखचितमनेकवदनान्वितम् । अनेकभुजसंयुक्तमनेकायुधमण्डितम् ॥१५३ नानावर्णधरं देवं शान्तमुग्रमुदायुधम् । अनेकनयनाकीर्णं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥१५४ ध्यायतो योगिनः सर्वमनोवृत्तिर्विनश्यति । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं चैतन्यज्योतिरव्‍ययम् ॥१५५ कदम्बगोलकाकारं तुर्यातीतं परात्परम् । अनन्तमानन्दमयं चिन्मयं भास्करं विभुम् ॥१५६ निवातदीपसदृशमकृत्रिममणिप्रभम् । ध्यायतो योगिनस्तस्य मुक्तिः करतले स्थिता ॥१५७ उन नाना आकार वाले, अनेक मुखों वाले, अनेक भुजाओं वाले, अनेक आयुधों वाले, अनेक वर्ण वाले, देवरूप, शान्त, उग्र, आयुधों को उठाये हुये, अनेक नेत्रयुक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा वाले विश्वरूप विष्णु का ध्यान करने से योगी की सब मनोवृत्तियां नष्ट हो जाती हैं। हृदत-कमल के मध्य स्थान में स्थित चैतन्य, ज्योतिरूप, अव्यय, कदम्ब के समान गोलाकार, तुर्यातीत, परात्पर, अनन्त, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

२१४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् आनन्दमय, चिन्मय, प्रकाशमान, निर्वात स्थान में स्थित दीपक के समान अकृत्रिम मणि की प्रभा वाले परब्रह्म का ध्यान करने से मुक्ति योगी के करतलगत रहती है ॥१५३-१५७॥ विश्वरूपस्य देवस्य रूपं यत्किंचिदेव हि । स्थवीयः सूक्ष्ममन्यद्वा पश्यन्हृदयपंकजे ॥१५८ ध्यायतो योगिनो यस्तु साक्षादेव प्रकाशते । अणिमादिफलं चैव सुखेनैवोपजायते ॥१५९ जीवात्मनः परस्यापि यच्चैवमुभयोरपि । अहमेव परं ब्रह्म ब्रह्माहमिति संस्थितिः ॥१६० समाधिः स तु विज्ञेयः सर्ववृत्तिविवर्जितः । ब्रह्म संपद्यते योगी न भूयः संसृतिं व्रजेत ॥१६१ एवं विशोध्य तत्त्वानि योगी निःस्पृहचेतसा । यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति ॥१६२ ग्राह्याभावे मनःप्राणौ निश्चयज्ञानसंयुक्तः । शुद्धसत्त्वे परे लीनो जीवः सैन्धवपिण्डवत् ॥१६३ मोहजालकसंघातं विश्वं पश्यति स्वप्नवत् । सुषुप्तिवच्चश्चरति स्वभावपरिनिश्चलः ॥१६४ निर्वाणपदमाश्रित्य योगी कैवल्यमश्नुते । इत्युपनिषत् ॥ विश्व-रूप देव का जो कुछ स्थूल, सूक्ष्म अथवा अन्य प्रकार का रूप है, उसका अपने हृदय-कमल में जो योगी ध्यान करता है वह साक्षात् उन्हीं के रूप का हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है ॥ १५८-१५९ ॥ जीवात्मा और परमात्मा दोनों का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर "मैं ही ब्रह्म हूँ" इस

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ २१५ स्थिति को पा लेना ही समाधि कहा जाता है। उसमें समस्त वृत्तियों का अन्त हो जाता है। जो योगी इस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है वह पुनः संसार में नहीं आता ॥ १६०-१६१ ॥ इस प्रकार योगी तत्व का शोध करता हुआ निस्पृह चित्त से ईंधन रहित अग्नि के समान स्वयं ही शान्त हो जाता है ॥ १६२ ॥ फिर उसके लिये कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं रहता, उसका मन और प्राण सच्चे आत्म-ज्ञान से युक्त हो जाते हैं और उसका जीव शुद्ध परमात्म तत्व में जल में नमक के समान लय हो जाता है ॥ १६३ ॥ उसे यह मोह जाल में फँसा हुआ संसार स्वप्न की तरह दिखाई देने लगता है और वह पूर्ण निश्चल हो स्वभाव से ही सुषुप्ति की-सी अवस्था में रहने लगता है ॥ १६४ ॥ ऐसा योगी निर्वाण पद को प्राप्त कर कैवल्य स्थिति में रहता है। यह उपनिषद् है। ॥ त्रिशिखिब्राह्मण उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

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अद्वयतारकोपनिषत्

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—यह पूर्ण है, वह पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण बनता है। पूर्ण में से पूर्ण ले लेने पर पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । अथातोऽद्वयतारकोपनिषदं व्याख्यास्यामो यतये जितेन्द्रियाय शमादिषड्गुणपूर्णाय ॥१॥ चित्स्वरूपोऽहमिति सदा भावयन् सम्यङ्निमीलिताक्षः किंचिदुन्मीलिताक्षो वाऽन्तर्दृष्ट्या भ्रू दहरादुपरि सच्चिदानन्दतेजः कूटरूपं परं ब्रह्मावलोकयन् तद्रूपो भवति ॥२॥ गर्भजन्मजरामरणसंसारमहद्भयात् संतारमति तस्मा- त्तारकमिति। जीवेश्वरौ मायिकाविति विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते तदद्वयं ब्रह्म ॥३॥ तत्सिद्ध्यर्थं लक्ष्यत्रयानुसंधानं कर्तव्यम् ॥४॥ देहमध्ये ब्रह्मनाडी सुषुम्ना सूर्यरूपिणी पूर्णचन्द्राभा वर्तते । सा तु मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रगामिनी भवति । तन्मध्ये तटित्कोटिसमानकान्त्या मृणालसूत्रवत् सूक्ष्माङ्गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति । तां दृष्ट्वा मनसैव नरः सर्वपापविना- शद्वारा मुक्तो भवति । फालोर्ध्वगललाटविशेषमण्डले निरन्तरं तेजस्तारकयोगविस्फुरणेन पश्यति चेत् सिद्धो भवति । तर्जन्य- ग्रोन्मीलितकर्णरन्ध्रद्वये तत्र फूत्कारशब्दो जायते । तत्र स्थिते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

अद्वयतारकोपनिषत् [ २१७ मनसि चक्षुर्मध्यगतनीलज्योतिस्थलं विलोक्य अन्तर्दृष्ट्या निर- तिशयसुखं प्राप्नोति । एवं हृदये पश्यति । एवमन्तर्लक्ष्यलक्षणं मुमुक्षुभिरुपास्यम् ॥५॥ ॐ। अब अद्वयतारक उपनिषद का कथन करते हैं जो संन्यासी, जितेन्द्रिय तथा शम-दम आदि षट गुणों से युक्त साधकों के लिये है ॥ १ ॥ आंखें बन्द अथवा अधखुली रख कर अन्तर दृष्टि से भ्रुकुटियों के ऊपर के स्थान में "मैं चित् स्वरूप हूँ" इस प्रकार का भाव निरन्तर रखते हुये सच्चिदानन्द, तेज समूह रूप परब्रह्म की झांकी करने से परब्रह्म रूप हो जाता है ॥ २ ॥ जो गर्भ, जन्म, जरा, मरण, संसार आदि महान पापों से तारता है, उसे तारकब्रह्म कहा जाता है। जीव और ईश्वर को मायिक जानते हुए अन्य सबको 'नीति-नेति' कहते हुए जो कुछ शेष बचता है, वही अद्वय ब्रह्म है ॥ ३ ॥ उसकी सिद्धि के लिये तीन लक्ष्यों का अनुसंधान करना उचित है ॥ ४ ॥ देह के मध्य में सुषुम्ना नाम की ब्रह्मनाड़ी पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाश वाली उपस्थित है, वह मूलाधार से आरम्भ होकर ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। इस नाड़ी के मध्य में करोड़ों बिजलियों के समान तेजवाली, मृणाल के सूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रसिद्ध है। इसका मन के द्वारा दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से छूट कर मुक्त हो जाता है। ललाट के ऊपर विशेष मण्डल में स्फुरित होने वाले तेज को तारक ब्रह्म के योग से सदैव देखता रहता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छेदों को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर फुत्कार का शब्द सुनाई देता है। उसमें मन को स्थित करके चक्षुओं के मध्य नीली ज्योति के स्थल को अन्तःदृष्टि से देखने पर अत्यन्त सुख की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार का दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्षणों का मोक्षाभिलाषी पुरुष को अभ्यास करना चाहिये ॥५॥

२१८ ] [ अद्वयतारकोपनिषत् अथ बहिर्लक्ष्यलक्षणम्। नासिकाग्रे चतुर्भिः षड्भिरष्टभिः दशभिः द्वादशभिः क्रमात् अंगुलान्ते नीलद्युतिश्यामत्वसहस्ररक्तभ- ङ्गीस्फुरत्पीतवर्णद्वयोपेतं व्योम यदि पश्यति स तु योगी भवति । चलदृष्ट्या व्योमभागवीक्षितुः पुरुषस्य दृष्ट्यग्रे ज्योतिर्मयूखा वर्तन्ते । तद्दर्शनेन योगी भवति । तप्तकाञ्चनसंकाशज्योतिर्मयूखा अपाङ्गान्‍ते भूमौ वा पश्यति तद्दृष्टिः स्थिरा भवति । शीर्षोपरि द्वादशांगुलसमीक्षितुः अमृतत्वं भवति । यत्र कुव स्थितस्य शिरसि व्योमज्योतिर्दृष्टं चेत स तु योगी भवति ॥६॥ अथ मध्यलक्ष्यलक्षणं प्रातश्चित्रादिवर्णखण्डसूर्यचक्रवत् वह्निज्वालावलीवत् । तद्विहीनान्तरिक्षवत् पश्यति । तदाकारा- कारितया अवतिष्ठति । तद्भूयोदर्शनेन गुणरहिताकाशं भवति । विस्फुरत्तारकाकारदीप्यमानगाढतमोपमं परमाकाशं भवति । कालानलसमद्योतमानं महाकाशं भवति । सर्वोत्कृष्टपरमद्युति- प्रद्योतमानं तत्त्वाकाशं भवति । कोटि सूर्यप्रकाशवैभवसंकाश सूर्याकाशं भवति । एवं बाह्याभ्यान्तरस्थव्योमपञ्चकं तारक- लक्ष्यम् । तद्दर्शी विमुक्तफलस्तोऽहग्व्योमसमानो भवति । तस्मात् तारक एव लक्ष्यं अमनस्कफलप्रदं भवति ॥७॥ तत्तारकं द्विविधं पूर्वार्धं तारकं उत्तरार्धं अमनस्कं चेति । तदेष श्लोको भवति— तद्योगं च द्विधा विद्धि पूर्वोत्तरविधानतः । पूर्वं तु तारकं विद्यात् अमनस्कं तदुत्तरमिति ॥८ अब बाह्य लक्ष्य के लक्षणों पर विचार करते—नासिकाग्र से क्रमशः चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील और श्याम रङ्ग का सा रक्त भृङ्ग के वर्ण का प्रकाश, जो पीत शुक्ल वर्ण से भी युक्त होता है, उसे जो आकाश में देखता है, वह योगी

अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २१६ होता है । चलती हुई दृष्टि से आकाश में देखने से ज्योति किरणें दिखलाई देती हैं, उनको देखने वाला योगी होता है। जब नेत्रों के कोने में तृप्त सुवर्ण के समान ज्योति मयूख का दर्शन होता है तो दृष्टि स्थिर हो जाती है। मस्तक के ऊपर बाहर अंगुल की दूरी पर ज्योति को देखने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है । चाहे जिस स्थान पर स्थित शिर के ऊपर जो व्योम ज्योति को देखता है, वह योगी होता है ॥ ६ ॥ इससे आगे मध्य लक्ष के लक्षण कहते हैं-प्रातः समय चित्रादि वर्ण युक्त अखण्ड सूर्य चक्रवत्, अग्नि की ज्वाला के सदृश्य और उनसे रहित अन्तरिक्ष के तुल्य देखता है, उनके आकार का होकर स्थिर रहता है, उसके दर्शन से फिर निर्गुण 'आकाश' हो जाता है। चमकने वाले तारे से प्रकाशित और प्रातःकाल के अँधेरे के समान 'परमाकाश' होता है । 'महाकाश' कालानल के समान प्रकाशयुक्त होता है । 'तत्त्वाकाश' सबसे उत्कृष्ट प्रकाश और प्रखर ज्योति वाला होता है। 'सूर्याकाश' करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान होता है। इस प्रकार बाहर और भीतर स्थित ये पांच आकाश तारक का लक्ष्य है। इस विधि से आकाश को देखने वाला उसी के समान बन्धनमुक्त हो जाता है । तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल प्रदान करने वाला होता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार यह तारक-योग दो प्रकार का होता है-पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध । इस विषय में यह श्लोक कहा है-"यह योग दो प्रकार का है-पूर्व और उत्तर । पूर्व को तारक कहा जाता है और उत्तर को अमनस्क ।" ॥८॥ अक्ष्यन्तस्तरयोः चन्द्रसूर्य प्रतिफलनं भवति । तारकाभ्यां सूर्यचन्द्र मण्डलदर्शनं ब्रह्माण्डमिव पिण्डाण्डशिरोमध्यस्थाकाशे रवीन्दुमण्डलद्वितयमस्तीति निश्चित्य तारकाभ्यां तद्दर्शनम् । अत्राप्युभयैक्यदृष्ट्या मनोयुक्तं ध्यायेत् तद्योगाभावे इन्द्रियप्रवृत्ते- रनवकाशात् । तस्मात् अन्तर्दृष्ट्या तारक एवाऽनुसंधेयः ॥६॥

२२० ] [ अद्वयतारकोपनिषत् यत्तारकं द्विविधः मूर्तितारकं अमूर्तितारकं चेति । यत् इन्द्रियान्तं तत् मूर्तिमत् । यत् भ्रूयुगातीतं तत् अमूर्तिमत् । सर्वत्र अन्तःपदार्थविवेचने मनोयुक्ताभ्यास इष्यते । तारकाभ्यां तदूर्ध्वस्थसत्त्वदर्शनात् मनोयुक्तेन अन्तरीक्षणेन सच्चिदानन्द- स्वरूपं ब्रह्म॑व । तस्मात् शुक्लतेजोमयं ब्रह्मेति सिद्धम् । तद्ब्रह्म मनःसस्कारिचक्षुषा अन्तर्दृष्ट्या वेद्यं भवति । एवं अमूर्तितारक- मपि । मनोयुक्तेन चक्षुषैव दहरादिकं वेद्यं भवति, रूपग्रहण प्रयोजनस्य मनश्चक्षुरधीनत्वात् बाह्यवदान्तरेऽपि आत्तमरश्चक्षुः संयोगेनैव रूपग्रहणकार्योदयात् । तस्मात् मनोयुक्ता अन्तर्दृष्टिः तारकप्रकाशाय भवति ॥१०॥ हम आंख के तारक (पुतलियों) से सूर्य और चन्द्र को देखते हैं। जिस प्रकार हम नेत्र के तारकों से बाह्य ब्रह्माण्ड के सूर्य और चन्द्र के दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने सिर रूप ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित सूर्य और चन्द्र का निश्चय करके उनका दर्शन करना चाहिए और दोनों को एक ही समझकर मन से उनका ध्यान करना चाहिए क्योंकि मन को इस भाव में युक्त न किया जायगा तो इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी । इसलिये साधक को अन्तर दृष्टि से तारक का ही अनुसंधान करना चाहिए ॥ ६ ॥ तारक दो प्रकार का होता है—मूर्त और अमूर्त । जो इन्द्रियों के अन्त में है, वह मूर्ति तारक है और जो दोनों भ्रुकुटियों से बाहर है, वह अमूर्ति है। अन्तः पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन द्वारा अभ्यास करना चाहिए । सत्व-दर्शन युक्त मन से अन्तर में निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का दर्शन होता है। इससे विदित होता है कि ब्रह्म शुक्ल तेजोमय है। उस ब्रह्म को मन सहित चक्षुओं की अन्तःदृष्टि से देखकर जानना । अमूर्ति तारक भी इसी विधि से मन संयुक्त नेत्रों से विदित होता है । रूप

दर्शन के विषय में मन चक्षुओं के अधीन रहता है और बाहर के समान भीतर भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही होता है । इसलिए मन सहित चक्षुओं से ही तारक का प्रकाश जाना जाता है ॥ १० ॥ भ्रूयुगमध्यबिले दृष्टिं तद्द्वारा ऊर्ध्वस्थिततेज आविर्भूतं तारकयोगो भवति । तेन सह मनोयुक्तं तारकं सुसंयोज्य प्रयत्नेन भ्रूयुग्मं सावधानतया किंचिदूर्ध्वमुत्क्षेपयेत् । इति पूर्वंतारकयोगः । उत्तरं तु अमूर्तिमत् अमनस्कमित्युच्यते । तालुमूलोर्ध्वभागे महान् ज्योतिर्मयूखो वर्तते । तत् योगिभिर्ध्येयम् । तस्मात् अणिमादिसिद्धिर्भवति ॥ ११ ॥ अन्तर्बाह्यलक्ष्ये दृष्टौ निमेषोन्मेषवर्जितायां सत्यां शांभवी मुद्रा भवति । तन्मुद्रारूढज्ञानिनिवासात् भूमिः पवित्रा भवति । तद्दृष्ट्या सर्वे लोकाः पवित्रा भवन्ति । तादृशपरमयोगिपूजा यस्य लभ्यते सोऽपि मुक्तो भवति ॥ १२ ॥ अन्तर्लक्ष्यज्ज्वलज्ज्योतिःस्वरूपं भवति । परमगुरूपदेशेन सहस्रारज्वलज्ज्योतिर्वा बुद्धिगुहानिहितचिज्ज्योतिर्वा षोडशान्त- स्थतुरीयचैतन्यं वा अन्तर्लक्ष्यं भवति । तद्दर्शनं सदाचार्यमूलम्॥१३॥ तारक योग का लक्ष्य दोनों भ्रुकुटियों के मध्य स्थान के ऊर्ध्व भाग में स्थित तेज का दर्शन करना है । उसके सहित मन से तारक की सुयोजना करके प्रयत्नपूर्वक दोनों भौहों को किंचित उच्च रखे । यह तारक-योग का पूर्व भाग है । दूसरे उत्तर भाग—अमूर्त्तिमान को अमनस्क कहते हैं । तालूमूल के ऊर्ध्वभाग में महाज्योति किरणमण्डल होता है । वही योगियों का लक्ष्य है । उसी से अणिमादिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ ११ ॥ जब साधक की अन्तर और बाह्य लक्ष्य को

२२२ ] [ अद्वयतारकोपनिषत् देखने वाली दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब शांभवी मुद्रा होती है । इस मुद्रा से युक्त ज्ञानी के निवास करने की भूमि पवित्र मानी जाती है और सब लोग उसके दर्शन से पवित्र हो जाते हैं। जो कोई ऐसे परमयोगी की पूजा करता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है ॥ १२ ॥ अन्त:लक्ष्य तरल ज्योति के रूप में हो जाता है। परम गुरु का उपदेश प्राप्त होने से सहस्रदल-कमल में तरल जल-ज्योति अथवा बुद्धि गुहा में रहने वाली ज्योति अथवा सोलह कला के अन्त में स्थित तुरीय चैतन्य अन्तर्लक्ष्य होता है। यह सदाचार मूलक दर्शन है ॥ १३ ॥ आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः । योगज्ञो योगनिष्ठश्च सदा योगात्मकः शुचिः ॥१४ गुरुभक्तिसमायुक्तः पुरुषज्ञो विशेषतः । एवंलक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥१५ गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः । अन्धकारनिरोधित्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥१६ गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः । गुरुरेव परा विद्या गुरुरेव परायणम् ॥१७ गुरुरेव परा काष्ठा गुरुरेव परं धनम् । यस्मात्तदुपदेष्टाऽसौ तस्माद्गुरुतरो गुरुरिति ॥१८ यः सकृदुच्चारयति तस्य संसारमोचनं भवति । सर्वजन्म- कृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति । सर्वान् कामानवाप्नोति । सर्व- पुरुषार्थसिद्धिर्भवति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥ १६ ॥ वह सम्पन्न आचार्य, विष्णु भक्त, मत्सरता रहित, योगज्ञाता, योगनिष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष रूप से लीन, इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है। 'गु' शब्द का

अद्वयतारकोपनिषत् ] [ २२३ अर्थ है अन्धकार और ‘रु’ का अर्थ है इसको रोकने वाला । अन्ध- कार को दूर करने से गुरु होता है। गुरु ही परमब्रह्म है, गुरु ही परम- गति है, गुरु ही पराविद्या है, गुरु ही परायण योग्य है, गुरु ही पराकाष्टा है, गुरु ही परम धन है ॥ १४-१८ ॥ वह गुरु उपदेश करने वाला होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है। इसका उच्चारण करने से संसार से छुटकारा हो जाता है, सब जन्मों के पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं, सब कामनायें पूरी हो जाती हैं, सब पुरुषार्थ सिद्ध हो जाते हैं। जो इस प्रकार जानता है, वही उपनिषद् का ज्ञाता है ॥१६॥ ॥ अद्वयतारक उपनिषद् समाप्त ॥

पाशुपतब्रह्मोपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ पूर्वकाण्डः अथ ह वै स्वयंभूर्ब्रह्मा प्रजाः सृजानोति कामकामो जायते कामेश्वरो वैश्रवणः ॥ १ ॥ वैश्रवणो ब्रह्मपुत्रो वालखिल्यः स्वयंभुवं परिपृच्छति—जगतां का विद्या का देवता जाग्रत्तूरीय योरस्य को देवो यानि कस्य वशानि कालाः कियत्प्रमाणाः कस्याज्ञया रविचन्द्रग्रहादयो भासन्ते कस्य महिमा गगनस्वरूप एतदहं श्रोतुमिच्छामि नान्यो जानाति त्वंब्रूहि ब्रह्मन् ॥ २ ॥ स्वयंभूरुवाच—कृत्स्नजगतां मातृका विद्या ॥ ३ ॥ द्विक्लि- वर्णसहिता द्विवर्णमाता त्रिवर्णसहिता चतुर्मात्रात्मकोङ्कारो

पूर्वकाण्ड ] [ २२५

पूर्वकाण्ड ] [ २२५ मम प्राणात्मिका देवता ॥४॥ अहमेव जगतत्रयस्यैकः पतिः ॥ ५ ॥ यम वशानि सर्वाणि युगान्यपि च ॥ ६ ॥ अहोरात्रादि- मतिसंवर्धिताः कालाः ॥७॥ मम रूपा रवेस्तेजश्चन्द्रनक्षत्र ग्रहतेजांसि ॥ ८ ॥ गगनो मम त्रिशक्तिमायास्वरूपः नान्यो मदस्ति ॥ ६ ॥ तमोमायात्मको रुद्रः सात्विकमायात्मको विष्णु राजसमायात्मको ब्रह्मा । इन्द्रादयस्तामसराजसात्मिका न सात्विकः कोऽपि अघोरः साधारणस्वरूपः ॥ १० ॥ हरि ॐ। एक समय स्वयंब्रह्मा के मन में इच्छा हुई कि “मैं प्रजा उत्पन्न करूं” तो कामनाओं के पूर्ण करने वाले रुद्र और कुबेर की उत्पत्ति हुई ॥ १॥ तब कुबेर और बालखिल्य ऋषि ने स्वयंभू से पूछा—जगत में विद्या क्या है ? जागृत और तुरीय अवस्था के देवता कौन हैं ? जगत किसके वश में है, काल का क्या प्रमाण है ? सूर्य चन्द्रादि किस की आज्ञा से प्रकाशित होते हैं ? आकाश के समान विशाल किस की महिमा है ? हम इन बातों को जानना चाहते हैं, आपके सिवाय कोई इनका जानने वाला नहीं हैं, अतएव इन बातों को बतलाइये ॥ २ ॥ स्वयंभू ने कहा—जगत की मातृका वर्णमाला रूप माता विद्या है ॥ ३॥ वह दो वर्ण (हंस) और तीन वर्ण (प्रणव) वाली है। दो वर्ण वाली भी तीन वर्ण की (प्रणव) ही है। चार मात्रा वाला ॐकार मेरा प्राण रूप देव है ॥ ४॥ तीनों लोकों का मैं ही एक मात्र पति हूँ ॥ ५ ॥ समस्त युग मेरे वश में रहते हैं ॥ ६ ॥ मुझसे ही दिन-रात्रि आदि काल उत्पन्न हुये हैं ॥ ७ ॥ सूर्य का तेज और चन्द्रमा, तारागण, ग्रह आदि में जो ज्योति है, वह मेरी ही है ॥ ८ ॥ यह आकाश मेरी तीन शक्तिशाली माया रूप है और मेरे सिवाय कहीं कुछ नहीं है ॥ ९ ॥ रुद्र-तमोगुण

२२६ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्

माया रूप है, विष्णु सतोगुणी माया रूप है और ब्रह्मा रजोगुणी माया रूप है। इन्द्रादि देव रजोगुण और तमोगुण दोनों से युक्त हैं, इनमें से कोई सात्विक नहीं है। केवल अघोर (शिव) ही सर्व सामान्यरूप के हैं ॥१०॥ समस्तयागानां रुद्रः पशुकर्ता रुद्रो यागदेवो विष्णु- रध्वर्युर्होतेन्द्रो देवता यज्ञभुङ् मानसं ब्रह्म महेश्वरं ब्रह्म ॥११॥ मानसो हंसःसोऽहं हंस इति तन्मयं यज्ञो नादानुसंधानम् । तन्मयविकारो जीवः ॥१२॥ परमात्मस्वरूपो हंसः । अन्तर्बहिश्चरति हंसः । अन्तर्गतो- ऽनवकाशान्तर्गतसुपर्णस्वरूपो हंसः ॥१३॥ षण्णवतितत्त्वतन्तुवद्व्यक्तं चित्सूत्रत्रयचिन्मयलक्षणं नवतत्त्वत्रिरावृतं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरात्मकमग्नित्रयकलोपेतं चिद्- ग्रन्थिबन्धनम् अद्वैतद्ग्रन्थिः ॥१४॥ यज्ञसाधारणाङ्गं बहि रन्तर्ज्वलनं यज्ञाङ्गलक्षणब्रह्मस्वरूपो हंसः ॥१५॥ उपवीतलक्षणसूत्रं ब्रह्मगा यसाः । ब्रह्माङ्गलक्षणयुक्तो यज्ञसूत्रम् । तद्ब्रह्मसूत्रम् । यज्ञसूत्रसम्बन्धी ब्रह्मयज्ञः तत्स्वरूपः ॥१६॥ अङ्गानि मात्राणि । मनोयज्ञस्य हंसो ब्रह्मसूत्रम् । प्रणवं ब्रह्मसूत्रं ब्रह्मयज्ञमयम् । प्रणवान्तर्वर्ती हंसो ब्रह्मसूत्रम् । तदेव ब्रह्मयज्ञमयं मोक्षक्रमम् ॥१७॥ ब्रह्मसंध्याक्रिया मनोयोगः । संध्याक्रिया मनोयागस्य लक्षणम् ॥१८॥ यज्ञ सूत्रं प्रणवम् । ब्रह्मयज्ञक्रियायुक्तो ब्राह्मण । ब्रह्मचर्येण चरन्ति देवाः । हंससूत्रचर्या यज्ञाः । हंसप्रणवयोरभेदः ॥१९॥ समस्त यज्ञों के कर्ता पशुपति रुद्र भगवान् हैं, विष्णु अध्वर्यु,

पूर्वकाण्ड ] [ २२७

पूर्वकाण्ड ] [ २२७ इन्द्र होता है। महेश्वर का मानस रूप ब्रह्मा की यज्ञ को भोगने वाला देवता है ॥ ११ ॥ उस मानस ब्रह्म का रूप है 'हंस सोऽहं ।" इस तन्मयता को प्राप्त करने के लिये जो यज्ञ किया जाता है, वह नादानुसंधान । तन्मयता का विकार ही जीव है ॥ १२ ॥ यह हंस परमात्मा का स्वरूप है जो बाहर और भीतर चलता रहता है। भीतर जाने पर अनवकाश वाले स्थान में यह हंस सुपर्ण स्वरूप ( ईश्वर ) होता है ॥ १३ ॥ छियानवे तन्तुओं के रूप में व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों से चिन्मय, नौ तत्वों से तिगुना किया हुआ, ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त चिद् ग्रन्थि से बँधा, अद्वैत ग्रन्थि से युक्त, यज्ञ के साधारण अङ्ग रूप में बाह्य और अन्तर को सुप्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत हंस ही है ॥१४-१५॥ इस प्रकार उपवीत के सूत्र ब्रह्म-यज्ञ रूप हैं, अर्थात् यज्ञोपवीत ब्रह्म का प्रतीक रूप है। इस प्रकार यज्ञोपवीत और ब्रह्मयज्ञ एक दूसरे के स्वरूप हैं ॥ १६ ॥ इसके अङ्ग मात्रा है। यज्ञोपवीत इस मनोयज्ञ का हंस है। ब्रह्म-यज्ञ से युक्त प्रणव भी ब्रह्मसूत्र हैं। प्रणव का अन्तवर्ती हंस भी ब्रह्म सूत्र है; यह ब्रह्म-यज्ञ मोक्ष का साधन रूप है ॥ १७ ॥ ब्रह्म-संध्या मानसिक यज्ञ की क्रिया है। संध्या-क्रिया मानसिक यज्ञ का लक्षण है ॥ १८ ॥ जो यज्ञ सूत्र, प्रणव, ब्रह्म-यज्ञ की क्रिया से युक्त है, वह ब्राह्मण है। ब्रह्मचर्य में देव रहते हैं। सूत्र रूप हंस यज्ञ में रहते हैं, हंस और प्रणव एक ही हैं ॥ १६ ॥ हंसस्य प्रार्थनास्त्रिकालाः । त्रिकालास्त्रिवर्णाः । त्रेताग्न्य- नुसंधांनो यागः । त्रेताग्न्यात्माकृतिकवर्णोद्धारहंसानुधानोऽन्तर्यागः ॥२०॥ चित्स्वरूपन्तन्मयं तुरीयस्वरूपम् । अन्तरादित्ये ज्योतिः

२२८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् स्वरूपो हंसः ॥२१॥ यज्ञाङ्गं ब्रह्मसंपत्तिः । ब्रह्मप्रवृत्तितत्प्रणव- हंससूत्रेणैव ध्यानमाचरन्ति ॥२२ प्रोवाच पुनः स्वयंभुवं प्रतिजानीते ब्रह्मपुत्रो ऋषिखालि- खिल्यः । हंससूत्राणि कतिसंख्यानि कियद्वा प्रमाणम् ॥२३॥ हृदादित्यमरीचीनां पदं षण्णवतिः । चित्सूत्राघ्राणयोः स्वनिर्गता प्रणवाधारा षडङ्गुलदशाशीतिः ॥२४॥ वामबाहुदक्षिणकट्योरन्तश्चरति हंस परमात्मा ब्रह्म- गुह्यप्रकारो नान्यत्र विदितः ॥२५॥ ये जानन्ति तेऽमृतफलकाः । सर्वकालं हंसं न प्रकाशकम् । प्रणवहंसान्तर्ध्यानप्रकृतिं विना न मुक्तिः ॥२६॥ हंस की प्रार्थना तीन समय की जाती है तीन काल में तीन वर्ण होते हैं। यह यज्ञ तीनों अग्नियों से करने का है। तीन अग्नि, आत्मा की आकृति और वर्ण वाले ॐकार रूप हंस का विचारना भीतर का यज्ञ है ॥ २० ॥ चित् रूप से तन्मय होना तुरीय का स्वरूप है। भीतर के सूर्य में हंस की ज्योति रूप है ॥ २१ ॥ यज्ञ का यह अंग ही ब्रह्म-सम्पत्ति है। इसलिये ब्रह्म की प्राप्ति के निमित्त प्रणव रूप हंस की साधना ही विधेय है ॥ २२ ॥ ब्रह्मपुत्र बालखिल्य ने पुनः स्वयंभू से पूछा—“हंस सूत्रों की संख्या कितनी है और उनका प्रमाण कितने हैं ? आप तो सब जानते हैं, बतलाइये ।” ॥ २३ ॥ स्वयंभू ब्रह्म ने उत्तर दिया— “हृदय--आदित्य की छियानवे किरणें हैं। चित्त सूत्र रूप घ्राण से स्वर सहित निकलने वाली धारा भी छियानवे अंगुल होती है ॥ २४ ॥ बाम भुजा के पास कमर के दाहिनी ओर के मध्य में परमात्मा हंस का निवास है ॥ २५ ॥ पर इस गुह्य विषय को कोई जान नहीं पाता। जिनको अमृतत्व प्राप्त हो गया है, वे ही

पूर्वकाण्ड [ २२६

पूर्वकाण्ड [ २२६ उस सर्वकाल प्रकाशमान हंस को जानते हैं । प्रणव रूप हंस का अन्तर्ध्यान किये बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता ॥ २६ ॥ नवसूत्रान्परिचर्चितान् । तेऽपि यद्ब्रह्म चरन्ति । अन्तरा- दित्यं न ज्ञातं मनुष्याणाम् ॥२७॥ जगदादित्यो रोचत इति ज्ञात्वा ते मर्त्या विबुधास्तत्पनब्रार्थनायुक्ता आचरन्ति ॥२८॥ वाजपेयः पशुहर्ता अध्वर्युं रिन्द्रो देवता अहिंसा धर्मयागः परमहंसोऽध्वर्युः परमात्मा देवता पशुपतिः ॥२९॥ ब्रह्मोपनिषदो ब्रह्म । स्वाध्याय- युक्ता ब्राह्मणाश्चरन्ति ॥३०॥ अश्वमेधो महायज्ञकथा । तद्राज्ञा ब्रह्मचर्यमाचरन्ति । सर्वेषां पूर्वोक्तब्रह्मयज्ञक्रमं मुक्तिक्रममिति ॥३१॥ ब्रह्मपुत्रः प्रोवाच । उदितो हंस ऋषिः । स्वयंभूस्तिरोधधे । रुद्रो ब्रह्मोपनिषदो हंसज्योतिः पशुपतिः प्रणवस्तारकः स एवं वेद ॥३२॥ जो रंगे हुये नौ सूत्रों के यज्ञोपवीत को धारण करते हैं, वे भी ब्रह्म समझ कर ही उसकी उपासना करते हैं । पर इन लोगों को अन्तरादित्य रूप ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता ॥ २७ ॥ सूर्य जगत को प्रकाश देता है, यह समझकर वे बुद्धिमान मनुष्य शुद्ध बुद्धि और ज्ञान के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं ॥ २८ ॥ बाजपेय यज्ञ पशुपति रूप हैं, उसका देवता इन्द्र होता है । अहिंसा का पालन बहुत बड़ा यज्ञ है, इसमें परमहंस अध्वर्यु, परमात्मा देवता है ॥ २९ ॥ वेद और उपनिषद् में जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है, उसी की ये स्वाध्याययुक्त ब्रह्मज्ञानी उपासना करते हैं ॥ ३० ॥ इस महायज्ञ का ज्ञान ही अश्वमेध यज्ञ है। इसके आश्रय से ही वे ब्रह्मज्ञान का आचरण करते हैं । पूर्वोक्त सब ब्रह्म यज्ञ ही मुक्ति प्रदान कर सकने वाले हैं ॥ ३१ ॥ ब्रह्मपुत्र ने फिर कहा—

॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥

२३० ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत् “हँस विषयक ज्ञान का उदय हो गया ।” यह सुन कर स्वयंभू तिरोधान हो गये । उपनिषद् में जिस हंस ज्योति को कहा गया है, वही रुद्र है और संसार से उद्धार करने वाला प्रणव ही पशुपति है ॥३२॥ ॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥ उत्तर काण्डः हंसात्ममालिका वर्णब्रह्मकालप्रचोदिता । परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी ॥१॥ अध्यात्मब्रह्मकल्पस्य आकुतिः कीदृशी कथा । ब्रह्मज्ञानप्रभा सन्ध्या कालो गच्छति धीमताम् । हंसाख्यो देवमात्माख्यमात्मतत्त्वप्रजा कथम् ॥२ अन्तःप्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः । अन्तर्गतप्रमागूढं ज्ञाननालं विराजितम् ॥३ शिवशक्त्यात्मकं रूपं चिन्मयानन्दवेदितम् । नादबिन्दुकला त्रीणि नेत्र विश्वविचेष्टितम् ॥४ त्रियङ्गानि शिखा त्रीणि द्वित्रीणि संख्यमाकृतिः । अन्तर्गूढप्रमा हंसः प्रमाणान्निर्गतं बहिः ॥५ 'हंस' का जप ही वर्ण ब्रह्म है, इसी से ब्रह्म की प्राप्ति होती है । परमात्मा और पुरुष भी यही है ॥ १ ॥ जो आत्मज्ञान से ब्रह्म सदृश्य हो गया हो उसके विषय में कहने को क्या रह जाता है ? ज्ञानी जन अपना समय ब्रह्म की चर्चा और उपासना में ही व्यतीत करते हैं । जब हंस और आत्मा में एकता स्थापित हो जाती है, तो प्रजा कहाँ हो सकती है ॥ २ ॥ भीतर में होने वाले प्रणव रूपी नाद से जो हंस विदित होता है, वही सब ज्ञान कराने वाला है । अन्तरानुभव द्वारा बाह्य ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ शिव