भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याश्च पृथिवी ँश्रिताः । अथो अन्ने नैव जीवन्ति । अथैनदपियन्त्यन्ततः । अन्नः ँहि भूतानां जेष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । "इस पृथिवी पर रहने वाले समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं । फिर अन्न से ही जीते हैं । अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं । अन्न ही सबसे श्रेष्ठ है । इसलिये वह औषधि रूप कहा जाता है । जो साधक अन्न को ब्रह्म रूप में उपासना करते हैं, वे उसे प्राप्त कर लेते हैं । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । सवा एष पुरुष विध एव । —तैत्तरीय २।२ "इस अन्न रसमय शरीर के भीतर जो प्राणमय पुरुष है, वह अन्न से व्याप्त है । यह प्राणमय पुरुष ही आत्मा है । अन्नं न निन्द्यात् । तद् व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रति- ष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान भवति । प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान कीर्त्या । —तैत्तरीय ३।७ "अन्न की निन्दा न करे । यह व्रत है । प्राण ही अन्न है । शरीर प्राण पर आधारित है । इसलिये वह अन्न में ही स्थित है । जो मनुष्य यह जान लेता है कि मैं अन्न में ही प्रतिष्ठित हूँ वह प्रतिष्ठावान् हो जाता है । अन्नवान हो जाता है । प्रजावान् हो जाता है, पशुवान् भी । वह ब्रह्मतेज से सम्पन्न होकर महान् बनता है । कीर्ति से सम्पन्न होकर भी महान् बनता है ।