भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( २४ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आगे चल कर अष्टम अनुवाक में और भी निर्देश है— अन्नं न परिचक्षीत । तद व्रतम्............अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम् । “ अन्न की अवहेलना न करे । यह व्रत है । अन्न को बहुत बढ़ावे । यह व्रत है ।” हाइवु, हाइवु, हाइवु । अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अह मन्नादो ऽहमन्नादो ऽहमन्नादः । —तैत्तिरीय ३।१० “आश्चर्य ! आश्चर्य ! ! आश्चर्य ! ! ! मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ । मैं अन्न हूँ। मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ । मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ ।” आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृति- लब्ध्ये सर्व ग्रन्थीनां विप्र मोक्ष स्तस्यै मृदित कषायाय तमसस्पा- दर्शयति भगवान सनत्कुमारः । “जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यांनी अन्तःकरण शुद्ध होता है अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है । उस विवेक से अज्ञानजन्य बन्धन-ग्रन्थियां खुलती हैं। फिर परम-तत्व का साक्षात्कार हो जाता है । यह ज्ञान नारद को भगवान् सनत्कुमार ने दिया ।” अथर्ववेद में अनुपयुक्त अन्न को त्याज्य ठहराया गया है । प्राचीनकाल में हर व्यक्ति आहार ग्रहण करने से पूर्व यह देखता था कि यह अन्न किस प्रकार के व्यक्ति द्वारा उपार्जित एवं निर्मित है । उसमें थोड़ा भी दोष होने पर उसे त्याग दिया जाता था । केवल पुण्यात्माओं का अन्न ही लोग स्वीकार करते Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi