१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ] [ २६१ वायुमूर्ध्वगतं कुर्वन् कुम्भकाविष्टमानसः । वाय्वाघातपवशादग्निः स्वाधिष्ठानगतो ज्वलन् ॥८४ ज्वलनाघातपवना घातोन्निद्रितोऽहिराट् । ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्त्वा विष्णुग्रन्थिं भिनत्त्यतः ॥८५ रुद्रग्रन्थिं च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट् । सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते ॥ सैवावस्था परा ज्ञेया सैव निर्वृत्तिकारणा ॥८६ इति ॥ इससे पिण्ड और ब्रह्माण्ड की, लिंग-देह और सूत्रात्मा की एकता होकर अपनी आत्मा और स्वयं प्रकाश रूप चैतन्य में ऐक्य भाव हो जाता है। कुण्डलिनी शक्ति पद्मतन्तु के समान होती है और कमल के कन्द के समान ही मूलकन्द को फणाग्र से देखकर, अपनी पूँछ को मुख में डालकर ब्रह्मरन्ध्र के मुख को ढक कर सोती रहती है। उसके लिए साधक को पद्मासन लगाकर, गुदा का आकुंचन करके कुम्भक द्वारा वायु को ऊपर चढ़ाना चाहिए। वायु के जोर से स्वाधिष्ठान चक्र की अग्नि को प्रज्ज्वलित करे ॥ ८३-८४ ॥ तब अग्नि और पवन दोनों के आघात से सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और ब्रह्म-ग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि तथा रुद्र-ग्रन्थि को तथा षट्चक्र को भेदन करती हुई सहस्र दल कमल में पहुँच जाती है। वहाँ यह शिव से शक्ति रूप में मिलकर आनन्द को प्राप्त होती है। यही श्रेष्ठ और मोक्षदायक अवस्था होती है ॥ ८६ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ द्वितीयोऽध्यायः अथाहं संप्रवक्ष्यामि विद्यां खेचरिसंज्ञिकाम् । यया विज्ञातवानस्य लोकेऽस्मिन्नजरामरः ॥१॥