१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् मृत्युव्याधिजराग्रस्तो दृष्ट्वा विद्यामिमां मुने । बुद्धिं दृढतरां कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत् ॥२ जरामृत्यु गदघ्नो यः खेचरीं वेत्ति भूतले । ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यासप्रयोगतः ॥३ तं मुने सर्वभावेने गुरुं मत्वा समाश्रयेत् । दुर्लभा खेचरी विद्या तदभ्यासोऽपि दुर्लभः ॥४ अभ्यासं मेलनं चैव युगपन्नैव सिध्यति । अभ्यासमात्रनिरता न विन्दन्ते ह मेलनम् ॥५ अब खेचरी विद्या के सम्बन्ध में बतलाते हैं, जिसके जानने से वृद्धावस्था तथा मृत्यु से छूट जाते हैं ॥ १ ॥ बुढ़ापा, मौत और रोगों में जो मनुष्य ग्रस्त हैं, उनको निश्चयपूर्वक इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए और जो महापुरुष ग्रन्थों से, भाव से, अभ्यास से इनका ज्ञान रखता है, उसी को सर्व भाव से गुरु मानकर तथा उसका आश्रय ग्रहण करके इसकी शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए क्योंकि यह खेचरी विद्या बड़ी कठिन है और उसका अभ्यास और भी अधिक कठिन है ॥ २-४ ॥ इसका अभ्यास और मेलन ( योग ) दोनों एक साथ करने से अथवा दोनों को अलग-अलग करने से भी सिद्धि प्राप्त कर सकना संभव नहीं होता ॥ ५ ॥ अभ्यासं लभते ब्रह्मन् जन्मजन्मान्तरे क्वचित् । मेलनं जन्मनां तत्तु शतान्तेऽपि न लभ्यते ॥६ अभ्यासं बहुजन्मान्ते कृत्वा तद्भावसाधितम् । मेलनं लभते कश्चिद्योगी जन्मान्तरे क्वचित् ॥७ यदा तु मेलनं योगी लभते गुरुवक्त्रतः । तदा तत्सिद्धिमाप्नोति यदुक्ता शास्त्रसंततौ ॥८ ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव मेलनं लभते यदा ।