भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय ] [ २६३ तदा शिवत्वमाप्नोति निर्मुक्तः सर्वसंसृतेः ॥६ शास्त्रं विनाऽपि संबोद्धुं गुरवोऽपि न शक्नुयुः । तस्मात्सुदुर्लभतरं लभ्यं शास्त्रमिदं मुने ॥१० अभ्यास तो किसी जन्म में मिल भी जाता है । पर मेलन (योग) सैकड़ों जन्म में भी नहीं मिलता ॥ ३ ॥ बहुत से जन्मों तक अभ्यास करने पर किसी जन्म में योगी 'मेलन' को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ जब साधक गुरु के मुख से 'मेलन' का मन्त्र प्राप्त करता है, तो उसे शास्त्रानुकूल सिद्धि की भी प्राप्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ जब साधक ग्रन्थ के अर्थ को समझ कर 'मेलन' को प्राप्त करता है, तो भी वह संसार से छूटकर शिवत्वं को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ शास्त्र का होना भी अत्यावश्यक है क्योंकि इसके बिना गुरु भी यथार्थ बोध नहीं करा सकते । इसी लिए शास्त्र का प्राप्त होना भी बड़े महत्व का है ॥१०॥ यावन्न लभ्यते शास्त्रं तावद्दुर्गा पर्यटेद्यतिः । यदा संलभ्यते शास्त्रं तदा सिद्धिः कर स्थिता ॥११ न शास्त्रेण विना सिद्धिर्दृष्टा चैव जगत्त्रये । तस्मान्मेलनदातारं शास्त्रदातारमच्युतम् ॥१२ तदभ्यासप्रदातारं शिवं मत्वा समाश्रयेत् । लब्ध्वा शास्त्रमिदं मह्यमन्येषां न प्रकाशयेत् ॥१३ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विजानता । यत्रास्ते च गुरुर्ब्रह्मन्दिव्ययोगप्रदायकः ॥१४ तत्र गत्वा च तेनाक्तविद्यां संगृह्य खेचरीम् । तेनोक्तः सम्यगभ्यासं कुर्यादादावतन्द्रितः ॥१५ जब तक शास्त्र की प्राप्ति न हो तब तक पर्यटन करते हुए प्रयत्नशील रहे । जब सच्चा शास्त्र मिल जायगा तब सिद्धि हाथ में ही

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