१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ] [ २६५ योग सिद्ध होता है। सोमांश 'स' कार है, उसका प्रतिलोम से नौवां अक्षर 'भ' होता है। फिर चन्द्रमा का बीजाक्षर 'स' है, उसका आठवां अक्षर विलोम से 'म' होता है। फिर से पांच अक्षर उलटा गिनने से 'प' अक्षर निकलता है। चन्द्रमा का बीज 'स' और अनेक वर्ण वाला 'क्ष' अन्तिम अक्षर है। (इस प्रकार "ह्रीं भं सं मं पं सं क्ष" यह खेचरी का बीज मन्त्र प्रकट होता है) ॥ १६—२० ॥ गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् । यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥२१ स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः । य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥२२ तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते । नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥२३ वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः । एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥२४ अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरी पथे । यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥२२ ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदां जपेत् । नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किंचित्सिद्धिभागभवेत् ॥२६ यह खेचरी मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। यह गुरु के उपदेश से ही सिद्ध होता है। जो नियम से इसका प्रतिदिन बारह बार जप करता है, उसे अन्तःकरण में स्थित देह सम्बन्धी माया नहीं व्यापती। जो इसे भावपूर्वक पाँच लाख जपेगा उसको खेचरी की सिद्धि स्वयमेव हो जायेगी, सब विघ्न दूर होकर देवताओं की प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २१—२३ ॥ इससे शरीर पर पड़ी हुई झुरियां मिट जाती हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं। इस महाविद्या को जब