भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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२६६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् भली प्रकार जान ले तब उसका अभ्यास भली भाँति करे ॥ २४ ॥ ऐसा न करने से खेचरी की सिद्धि न होकर उलटा कष्ट ही उठाना पड़ता है । विधिपूर्वक अभ्यास करने पर भी सफलता न हो तो भी 'सम्मेलक' (गुरु शिक्षक आदि) के बताये अनुसार सदैव इसका जप करता रहे । बिना उपयुक्त शिक्षक के इनमें कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २५—२६ ॥ यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् । ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥२७ तालूमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् । स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥२८ स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेत लोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२६ हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोम मात्र समुच्छिनेत् ॥३० जब इस विद्या के शास्त्र का ठीक तरह से ज्ञान हो जायेगा तब साधक की सिद्धि प्राप्त करने में देर न लगेगी ॥ २७ ॥ सर्व प्रथम साधक को सात दिन तक तालु के मूल स्थान को गुरु के आदेश के अनुसार घिसकर वहां का सब मैल दूर करना चाहिए ॥ २८ ॥ फिर थूहर के पत्ते के समान उत्तम धार वाले शुद्ध चाकू आदि से तालूमूल को एक बाल के बराबर काटे अथवा गुरु या शिक्षक से कटावे) ॥ २६ ॥ कटे स्थान के ऊपर हर्र और सैन्धे नमक का चूर्ण भुरभुराता रहे। सात दिन के पश्चात् फिर पूर्ववत् बाल बराबर काटे ॥ ३० ॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् । षण्मासाद्रसनामूलं शिराबन्धं प्रनश्यति ॥३१