भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय ] [ २६७ अथ वागीश्वरीधाम शिरो वस्त्रेण वेष्टयेत् । शनैरुत्कर्षयेद्योगी कालवेलाविधानवित् ॥३२ पुनः षाण्मासमात्रेण नित्यं संघर्षणान्मुने । भ्रू मध्यावधि चाप्येति तियक्कर्णबिलावधि ॥३३ अधश्च चुबुकं मूलं प्रयाति क्रम चारिता । पुनः संवत्सराणां तु तृतीयादेव लीलया ॥३५ केशान्तमूर्ध्वं क्रमति तिर्यक्शाखाऽवधिर्मुने । अधस्तात्कण्ठकूपान्तं पुनर्वर्षत्रयेण तु ॥३५ ब्रह्मरन्ध्रं समावृत्य तिष्ठेदेव न संशयः । तिर्यक् चूलितलं याति अधः कण्ठबिलावधि ॥३६ इस क्रम से निरन्तर प्रयत्न करते रहने से जीभ का तालू के साथ वाला बन्धन कट जायगा ॥ ३१ ॥ तब जीभ के अग्रभाग को कपड़े से लपेट कर धीरे-धीरे दोहन करे ( बाहर की तरफ खींचे ) । इस प्रकार छः मास तक अभ्यास करने से जीभ बढ़कर भौंहों के मध्य तक पहुँचने लगेगी और बगल में कान के छेद तक पहुंचने लगती है । बाहर की तरफ जीभ थोड़ी तक पहुंच जाती है । जब इस अभ्यास को बराबर किया जाय तो तीसरे वर्ष में जीभ बालों तक पहुंच जाती है और बगल में कन्धे तक तथा नीचे कण्ठकूप तक पहुंचने लगती है । आगामी तीन वर्ष के अभ्यास से जीभ ब्रह्मरन्ध्र तक पहुंचकर उसे ढक लेगी इसमें संशय नहीं । तब वह गर्दन के पीछे तक और नीचे कण्ठ के अन्त तक पहुँच जायगी ॥ ३२-३६ ॥ शनैः शनैर्मस्तकाच्च महावज्रकवाटभित् । पूर्वं बीजयुता विद्या ह्याख्याता याति दुर्लभाम् ॥३७ तस्याः षडङ्गं कुर्वीत तया षट्स्वरभिन्नया । कुर्यादिकं करन्यासं सर्वसिद्धिप्रदिहेतवे ॥३८