भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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२७६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् समय भी उस ध्यान को स्थिर रखता है, वह जीवन्मुक्त ही है, वह धन्य है और कृतकृत्य है ॥ ३३ ॥ जब उसका अन्तिम समय आ जाता है तब वह जीवन्मुक्त से विदेहमुक्त पद को प्राप्त हो जाता है, उसका अन्त ऐसा ही होता है जैसे हवा का चलना बन्द हो जाता है ॥ ३४ ॥ जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, से रहित अर्थात् पञ्चभूतों से परे, नित्य और अव्यय है, जो आदि और अन्त से रहित है, जो महान और ध्रुव (अटल) है, वही शुद्ध और अविकारी ब्रह्म अन्त में शेष रहता है ॥ ३५ ॥ ॥ योगकुण्डली उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—