१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२७६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् समय भी उस ध्यान को स्थिर रखता है, वह जीवन्मुक्त ही है, वह धन्य है और कृतकृत्य है ॥ ३३ ॥ जब उसका अन्तिम समय आ जाता है तब वह जीवन्मुक्त से विदेहमुक्त पद को प्राप्त हो जाता है, उसका अन्त ऐसा ही होता है जैसे हवा का चलना बन्द हो जाता है ॥ ३४ ॥ जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, से रहित अर्थात् पञ्चभूतों से परे, नित्य और अव्यय है, जो आदि और अन्त से रहित है, जो महान और ध्रुव (अटल) है, वही शुद्ध और अविकारी ब्रह्म अन्त में शेष रहता है ॥ ३५ ॥ ॥ योगकुण्डली उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्। भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥ बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दचाक्षरे क्षीणे निशब्दं परमं पदम् ॥२॥ अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्। तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥३॥ वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥४॥ पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्। तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥५॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि। स्थिरबुद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥६॥ यदि पर्वत के समान अनेक योजन विस्तार वाले पाप भी हों, तो भी वे ध्यान योग से नष्ट हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त और किसी तरह उनका नाश नहीं होता ॥ १॥ बीजाक्षर परम बिन्दु है और उसके ऊपर नाद की स्थिति है। जब वह नाद (शब्द) अक्षर में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२७८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् लय हो जाता है तब शब्द रहित परमपद का रूप होता है ॥ २ ॥ अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है, उसके पाने से ही योगी के संशय की निवृत्ति होती है ॥ ३ ॥ केशाग्र के सौवें भाग का हजारवां भाग और उसका आधे का भाग, उसका भी क्षय हो जाने पर निरंजन होता है ॥ ४ ॥ जिस प्रकार फूलों में गन्ध रहती है, दूध में घी रहता है, तिल में तेल और पाषाण में सोना होता है, जिस प्रकार माला के दाने सूत में पिरोये रहते हैं, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में व्याप्त हैं। स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित होकर ऐसे ब्रह्म क ा ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है ॥ ५-६ ॥ तिलानां तु यथा तैल पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्याभ्यान्तरे स्थितः ॥७ वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला । सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः । पृथिव्याग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥९ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्ष यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१० उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके । द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥११ मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्राणवांशके । अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२ उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः । अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम् ॥१३ जिस प्रकार तैल का आश्रय तिल : का आश्रय पुष्प है इसी प्रकार ब्रह्म पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित
रहता है ॥ ७ ॥ वृक्ष को सम्पूर्ण जान लेने पर उसकी छाया निष्कल होती है, इसी प्रकार आत्मा सब कला रहित स्थान में स्थित रहता है ॥ ८ ॥ सब मोक्षाभिलाषी व्यक्ति ॐकार रूप एकाक्षर ब्रह्म का ही ध्यान करते हैं। इस प्रणव के प्रथम अंश ‘अ’कार में पृथिवी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह का लय होता है। दूसरे अंश ‘उ’कार में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः और विष्णु का लय होता है। तीसरे अंश ‘म’कार में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वर्लोक और महेश्वर का लय होता है। ‘अ’कार पीले रङ्ग और रजोगुण वाला कहा जाता है, ‘उ’कार श्वेत वर्ण और सतोगुण वाला और ‘म’कार कृष्णवर्ण तथा तामस गुण वाला है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पद, तीन नेत्र और पाँच दैवत वाला होता है ॥ ९-१३ ॥
ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः । प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ॥१४ अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् । निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥१५ ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः । ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१६
ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः । अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः ॥१७ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥१८ हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अंगुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम् ॥१९ इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् । ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्यालावलीवृतम् ॥२०
इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं
२८० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते । रेचा रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२१ इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं माना जा सकता। यह प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। बाण से सावधानी के साथ तन्मय होकर इस लक्ष्य को बेध करने और 'अवर' को जान लेने से सब क्रियाओं से निवृत्ति हो जाती है ॥ १४-१५ ॥ ॐकार से देवता हुए, ॐकार से स्वर हुए और ॐकार से ही तीनों लोक के समस्त चराचर हुये ॥ १६ ॥ इसका ह्रस्व अंश पापों को हरता है, दीर्घ अव्यय स्वरूप सम्पत्ति को देता है, इस प्रकार अर्धमात्रा युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥ १७ ॥ तेल की अविच्छिन्न धार के समान, घण्टा के दीर्घ निनाद के समान नाद के अग्र में वाच्य रहित प्रणव है, उसे जानने वाला ही वेदज्ञ है ॥ १८ ॥ हृदयरूपी कमल की कर्णिका में दीपशिखा तुल्य, अंगुष्ठमात्र आकार के ॐकार रूप ईश्वर का ध्यान करे ॥ १६ ॥ इड़ा ( बांयी नासिका ) से वायु को उदर में भरे और देह के मध्य में ज्वालामय ॐकार का ध्यान करे। पूरक को ब्रह्मा और कुम्भक को विष्णु और रेचक को रुद्र कहा गया है, ये तीनों प्राणायाम के देवता हैं ॥ २०- २१ ॥ आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासा देवं पश्येन्निगूढवत् ॥२२ ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणांतिकम् । यावद्वलं समादध्यात्सम्यङ् नादलयावधि ॥२३ गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम् । पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४
ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८१ आत्मा को नीचे की अरणी के रूप में ग्रहण करके प्रणव को ऊपर की अरणी बनावे । इन दोनों के मंथन रूप ध्यानाभ्यास से गूढ़ तत्व का दर्शन करे ॥ २२ ॥ ॐकार की ध्वनि के नाद सहित रेचक का अन्त होने पर नाद का लय हो जाता है। इस प्रकार का ध्यान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करे ॥ २३ ॥ गमनागमन में स्थित और गमनादि से शून्य ऐसे करोड़ों सूर्य की दीप्ति के सदृश्य, सबके हृदय में रहने वाले हंसात्मक ॐकार का जो दर्शन करते हैं वे निष्पाप हो जाते हैं ॥ २४ ॥ यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थिति प्रलयकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२५ अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम् । तस्य मध्यगतो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥२६ शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥२७ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः ॥२६ अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥३० सृष्टि, स्थिति और लय होने का कारण जो मन में है उसका जहाँ विलय होता है वहीं विष्णु का परमपद है ॥ २५ ॥ आठ दल और बत्तीस पंखुड़ियों का जो हृदय कमल है उसके मध्य में सूर्य और सूर्य के मध्य में चन्द्रमा स्थित है ॥ २६ ॥ चन्द्रमा के मध्य में
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८२ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् अग्नि है और अग्नि के मध्य में प्रभा है, प्रभा के मध्य में नाना प्रकार के रत्नों से जड़ा पीठस्थान है, उसके मध्य में निरञ्जन भगवान् वासुदेव हैं, जो श्रीवत्स कौस्तुभमणि और मणि मुक्ताओं का धारण किये हुये हैं ॥ २७—२८ ॥ शुद्ध स्फटिक के समान, करोड़ों चन्द्रमा की-सी प्रभा वाले महाविष्णु का विनयावनत भाव से ध्यान करे ॥ २६ ॥ अलसी के पुष्प के समान नाभिस्थान में प्रतिष्ठित चार भुजा वाले महाविष्णु का पूरक करता हुआ ध्यान करे ॥ ३० ॥ कुम्भकेन हृदि स्थाने चिन्तयेत्कमलासनम् । ब्राह्माणं रत्नगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥३१॥ रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥३२॥ अब्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥३३॥ शताब्दं शतपत्राढ्यं विप्रकीर्णाब्जकर्णिकम् । तत्रार्कचन्द्रवह्नीनामुपर्युपरि चिन्तयेत् ॥३४॥ पद्मस्योद्घाटनं कृत्वा सूर्यचन्द्राग्निवर्चसः । तस्य हृद्वीजमाहृत्य आत्मानं चरते ध्रुवम् ॥३५॥ कुम्भक के समय हृदय स्थान पर कमलासन पर विराजमान लालिमायुक्त और गौर वर्ण वाले, चार मुँह वाले पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे ॥ ३१ ॥ रेचक के समय ललाट स्थान में श्वेत स्फटिक के समान, निष्फल, पापनाशक त्रिलोचन भगवान शङ्कर का ध्यान करे ॥ ३२ ॥ कदली पुष्प के समान नीचे की तरफ फूल, ऊपर डण्डी, नीचे मुख, इस प्रकार सर्व वेदमय शिव हैं ॥ ३३ ॥ सौ आरे, सौ पत्ते और विस्तीर्ण पंखुड़ियों से युक्त हृदय-कमल पर सूर्य, चन्द्रमा
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८३ और अग्नि का एक के ऊपर एक करके दर्शन करे। कमल के विकसित होने से सूर्य, चन्द्र, अग्नि का बोध होता है। इनके बीज को ग्रहण करने से स्थिर आत्म-स्थिति प्राप्त होती है ॥ ३४-३५ ॥ त्रिस्थानं च त्रिमागं च त्रिब्रह्मा च त्रयाक्षरम् । त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥३६ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥३७ यथै वोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः । तथै वोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८ अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम् । कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत् ॥३६ भ्रू मध्ये तु ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतस्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत् ॥४० तीन स्थान, तीन पात्र; तीन ब्रह्मा, तीन अक्षर, तीन मात्रा और अर्धमात्रा में जो इनको जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३३ ॥ तेल की धार के समान अविच्छन्न और दीर्घ घण्टानिनाद के सदृश्य विन्दु, नाद, कला से अतीत को जो जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार कमल की नाल से जल को खींच लिया जाता है, उसी प्रकार वायु को खींचकर योगी योग साधन करे ॥ ३८ ॥ सम्पुटित कमल को अर्धमात्रा रूप करके वायु को सुषुम्ना द्वारा खींचकर भ्रुकुटी स्थान में लय करे ॥ ३६ ॥ भौंहों के मध्य में ललाट स्थान में, जहाँ नासिका का मूल है, वहाँ पर अमृत स्थान है, वही ब्रह्म का महान् स्थान है ॥ ४० ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८४ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥४१ आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः । एतेषामतुलान्भेदान् विजानाति महेश्वरः ॥४२ सिद्धं भद्रं तथा सिंहं पद्मं चेति चतुष्टयम् । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥४३ योनिस्यानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥४४ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिंगं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥४५ आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि— ये योग के छः अंग हैं ॥ ४१ ॥ संसार में जितनी जीव योनियाँ हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं, इनके बहुसंख्यक भेदों को महेश्वर ही जानते हैं ॥ ४२ ॥ सिद्ध, भद्र, सिंह, पद्म चार मुख्य आसन हैं । प्रथम चक्र आधार है और दूसरा स्वाधिष्ठान है ॥ ४३ ॥ इन दोनों के मध्य में कामरूप योनिस्यान है । गुदास्थान में जो आधार-चक्र है उसमें चार दल वाला कमल है । उसके मध्य में काम नाम वाली योनि है जिसकी वन्दना सिद्ध करते हैं । योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख लिङ्ग वर्तमान है ॥ ४४-४५ ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित् । तप्तचामीकराकरं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥४६ चतुरस्रमुपर्यग्नेरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् । स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥४७ स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यद्वत्वायुना पूरितं वपुः ॥४८
ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८५ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥४६ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत् ॥५० तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृता ॥५१ उसके मस्तक में जो मणि के समान प्रकाश है उसे योगीजन ही जानते हैं । तप्त सुवर्ण के से वर्ण वाला और बिजली की धारा के समान सुप्रकाशित, अग्नि स्थान से चार अंगुल ऊर्ध्व और मेढ्र स्थान के नीचे स्वशब्दयुक्त प्राण स्थित है, जो स्वाधिष्ठान चक्र के आश्रय में रहता है ॥ ४६-४७ ॥ मेढ्र के मूल में स्वाधिष्ठान चक्र है। वहाँ मणि के तन्तु के समान वायु से पूर्ण शरीर है ॥ ४८ ॥ नाभिमण्डल में जो चक्र है वह मणिपूरक कहा जाता है । वहीं पर बारह आरा वाले महाचक्र में पुण्य-पाप का नियंत्रण होता है ॥ ४६ ॥ जब तक जीव इस तत्व को नहीं जान लेता तब तक उसे भ्रमते रहना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के आकार वाला कन्द है, उसी से बहत्तर हजार नाड़ियां निकली हैं, जिनमें से बहत्तर को मुख्य कहा गया है ॥ ५०-५१ ॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥५२ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहुरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥५३ एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिनां सदा । सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥५४ इडापिंगलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः । इडा वामे स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ॥५५
२८६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिष सुषुम्ना मध्य देशस्था प्राणमार्गस्त्रयः स्मृताः । प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च ॥५६ नागः कूर्मः कृकरको देवदत्तो धनंजयः । प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥५७ इन बहत्तर में से दश प्रधान नाड़ियां प्राण को चलाने वाली कही गई हैं जो इस प्रकार हैं—इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शङ्खिनी ॥ ५२— ५३ ॥ योगियों को इस नाड़ी-चक्र का ज्ञान होना परमावश्यक है। इनमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित हैं और प्राण सदैव इन्हीं में चला करता है। इड़ा बाँयी ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर, सुषुम्ना दोनों के मध्य में स्थित है, ये तीनों प्राण के मार्ग स्वरूप हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय—इस प्रकार ये प्राणादि पांच और नागादि पाँच वायु प्रसिद्ध हैं ॥ ५४—५७ ॥ एते नाडीसहस्रेषुवर्तन्ते जीवरूपिणः । प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं व धावति ॥५८ वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते । आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः ॥५९ प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत् । अपानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति ॥६० खगरज्जुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित् । हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥६१ हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । शतानि षड् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२
ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८७ एतत्संख्याऽन्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा ॥६३ इस प्रकार ये वायु जीव रूप से सहस्रों नाड़ियों में रहते हैं । प्राण और वायुओं के वश में पड़कर जीव ऊपर नीचे आता-जाता रहता है । वह कभी बाएँ और कभी दाहिने मार्ग से चलता है, पर चञ्चल होने से दिखाई नहीं पड़ता । जैसे हाथों से इधर-उधर फेंकी हुई गेंद दौड़ती रहती है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुओं के फेंकने से जीव को कहीं विश्राम का स्थान नहीं मिलता । अपान प्राण को खींचता है और प्राण अपान को खींचता है, उसी प्रकार जैसे रस्सी में बँधा हुआ पक्षी खींच लिया जाता है । इस रहस्य को जो जानता है वह योगी है । यह प्राण 'ह'कार ध्वनि द्वारा बाहर जाता है और 'स'कार से भीतर आता है । इस प्रकार जीव सदा 'हँस-हँस' मन्त्र का जप करता रहता है और एक दिन रात्रि में इस जप की संख्या इक्कीस हजार छः सौ होती है । इसको अजपा गायत्री कहते हैं, यह योगियों के लिए मोक्ष प्रदायिनी है ॥ ६०—६३ ॥ अस्याः संकल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते । अनया सदृशो विद्या अनया सदृशो जपः ॥६४ अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति । येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम् ॥६५ मुखेनाच्छाद्यं तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी । प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥६६ सूचिवद्गुणमादाय प्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया । उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात् ॥६७ कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत् ॥६८
२८८ ] [ अमृतबिन्दूपनि कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वाऽथ पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेतसि । वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयन्पूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्ति प्रभावान्नरः ॥६६॥ पद्मासनस्थितो योगी नाडीद्वारेषु पूरयन् । मारुतं कुम्भयन्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥७० इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य पापों से छूट जाता है। न तो इसके समान कोई विद्या है, न जप है, न कोई पुण्य है, न हो सकता है। इसके द्वारा मनुष्य बिना कठिनाई के ब्रह्म-स्थान तक पहुँच जाता है ॥ ६४-६५ ॥ परमेश्वरी-शक्ति उस मार्ग को अपने मुख से ढक कर सोई हुई है। वह वह्नियोग द्वारा जागृत होती है और तब सुषुम्ना में मन और प्राण वायु सहित ऊपर जाती है, उसी प्रकार जैसे सुई तागे को ले जाती है और जैसे ताली से द्वार को खोल लिया जाता है वैसे ही योगी कुण्डलिनी शक्ति द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं ॥ ६६- ६८ ॥ हाथों को सम्पुटित करके, दृढ़तापूर्वक पद्मासन लगाकर, ठोड़ी से उरु प्रदेश को मजबूती से दबाकर, ब्रह्म का चित्त में ध्यान करते हुए, अपान वायु को बारम्बार ऊपर की ओर चलाता हुआ और खींची हुई प्राणवायु को नीचे लेता हुआ साधक कुण्डलिनी शक्ति के प्रभाव को अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ जो योगी पद्मासन पर स्थित होकर नाड़ियों में वायु को भर कर कुम्भक द्वारा रोकता है वह निःसंशय रूप से मुक्ति पाता है ॥ ७० ॥ अङ्गानां मर्दन कृत्वा श्रमजातेन वारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरपानरतः सुखी ॥७१ ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः । अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥७२
ध्यानबिन्दूपनिषद् In Public Domain. Digitization by eGangotri २८१ कन्दोर्ध्वकुण्डलीशक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् । अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः ॥ ७३ युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् । पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम् ॥ ७४ अपानमूर्ध्वमुत्कृष्य मूलबन्धोऽयमुच्यते । उड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तंमहाखगः ॥ ७५ उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धो विधीयते । उदरे पश्चिमं ताणं नाभेरुर्ध्वं तु कारयेत् ॥ ७६ श्रम करने से जो पसीना निकले उसे शरीर में ही मल लेना चाहिये; कटु, अम्ल और नमक को त्याग कर दूध का भोजन करना चाहिये । इस प्रकार साधन करने वाला मिताहारी, ब्रह्मचारी योगी एक वर्ष के भीतर सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं ॥७१-७२॥ कन्द के ऊर्ध्वभाग में रहने वाली कुण्डलिनी द्वारा योगी निश्चय रूप से सिद्ध होता है । नियमित रूप से मूलबन्ध का अभ्यास करने से प्राण और अपान की एकता होती है, मल-मूत्र कम हो जाता है और वृद्ध भी युवा हो जाता है । एड़ी से योनि स्थान को दबा कर गुदा को आकुञ्चित करे और अपानवायु को ऊपर की तरफ खींचे । इसको मूलबन्ध कहते हैं । अब उड्डियाण की विधि कहते हैं कि जिस प्रकार महाखग विश्राम करता है उस प्रकार होकर उदर की पश्चिम 'ताण' को नाभि के ऊपर करे ॥७३-७६॥ उड्डियाणोऽप्ययं बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी । बध्नाति हि शिरोजात्मधोगामिनभोजलम् ॥ ७२ ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः । जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ॥ ७८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२६० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति । कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ॥ ७६ भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी । न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा ॥ ८० यह उड्डियाण बन्ध मृत्यु के लिये ऐसा ही है जैसे हाथी के लिए सिंह । अब जालन्धर बन्ध को कहते हैं जिससे शिरोकाश से उत्पन्न होने वाले जल ( अमृत ) को ऊपर ही रोक दिया जाता है और इस प्रकार कर्म बन्धन और क्लेशों को निवारण किया जाता है । जालन्धर बन्ध में कण्ठ का संकोचन किया जाता है जिससे अमृत अग्नि में नहीं गिरता और वायु नहीं दौड़ता । अब खेचरी को बतलाते हैं कि जिह्वा को लोटाकर कपाल कुहर में ले जाय और दोनों भौंहों के मध्य में दृष्टि जमाकर रखे । इसके अभ्यास से रोग और मरण का भय जाता रहता है और निद्रा, भूख, प्यास भी नहीं सताती ॥८०॥ न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् । पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ॥ ८१ बध्यते न च कालेन यस्य मुद्राऽस्ति खेचरी । चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा भवति खेगता ॥ ८२ तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा. सिद्धनमस्कृता । खेचर्या मुद्रया यस्य विवरं लम्बि कोर्ध्वतः ॥ ८३ बिन्दुः क्षरति नो यस्य कामिन्यालिङ्गितस्य च । यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः ॥ ८४ यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति । गलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तो योनिमण्डले ॥ ८५
व्रजत्यूर्ध्वं हठाच्छक्त्या निबद्धो योनिमुद्रया । स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा ॥ ८६ पाण्डरं शुक्लम इत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः । विद्रुमद्रुमसंकाशं योनिस्थाने स्थितं रजः ॥ ८७ शशिस्थाने वसेद्विन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् । बिन्दुः शिवो रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः ॥ ८८ जो खेचरी को जानता है उसे मूर्छा नहीं होती, न रोगों से पीड़ित होता है, न कर्मों में लिप्त रहता है। जिसका चित्त खेचरी मुद्रा के साधन से आकाश में रहता है और जिह्वा की आकाशगामिनी होती है वह काल के बन्धन में नहीं पड़ता ॥८१-८२॥ इसलिए इस खेचरी मुद्रा को सिद्ध योगी नमस्कार करते हैं। खेचरी मुद्रा द्वारा जिसने तालू के छेद को बन्द कर लिया है, उसका वीर्य क्षय नहीं होता चाहे वह स्त्री का आलिंगन ही क्यों न करे और जब तक वीर्य देह में स्थित है तब तक मृत्यु का भय कैसा ? ॥८३-८४॥ जब तक खेचरी मुद्रा रहेगी तब तक वीर्य पतन नहीं हो सकता और यदि किसी प्रकार वीर्य स्खलित होकर योनिस्थान में चला भी जाय तो योनिमुद्रा द्वारा उसे शक्तिपूर्वक फिर ऊपर की तरफ खींच लिया जाता है। वह वीर्य श्वेत तथा रक्तवर्ण—दो प्रकार का होता है। श्वेतवर्ण वाला शुक्ल कहा जाता है और लाल रङ्ग वाला महाराज कहलाता है। मूंगे के समान रङ्ग वाला रज (योगी के) योनि स्थान में स्थित है और शुक्ल चन्द्रस्थान में रहता है। उन दोनों का एक होना बड़ा कठिन है। शुक्ल शिव रूप है और रज शक्ति रूप है, वीर्य चन्द्रमा है और रज सूर्य है ॥८५-८८॥ उभयोः संगमादेव प्राप्यते परमं वपुः । वायुना शक्ति चालेन प्रेरितं खे यथा रजः ॥ ८९
रविणैकत्वमायाति भवेद्दिव्यवपुस्तदा । शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् ॥ ६० द्वयोः समरसीभावं यो जानाति स योगवित् । शोधनं मलजालानां घटनं चन्द्रसूर्ययोः ॥ ६१ रसानां शोषणं सम्यङ् महामुद्राऽभिधीयते ॥ ६२ वक्षोन्यस्तहनुर्निपीड्य सुषिरं योनेश्च वामाङ्घ्रिणा । हस्ताभ्यामनुधारयन् प्रविततं पादं तथा दक्षिणम् । आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनै रेचये— देषा पातक नाशिनी ननु महामुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥ ६३ इन दोनों के संयोग से परम देह प्राप्त होती है । वायु द्वारा शक्ति को चलित करने से जब रज आकाश को प्रेरित होता है और सूर्य के साथ मिल जाता है तब शरीर दिव्य हो जाता है । शुक्ल वर्ण बिन्दु चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से समन्वित है, जो इन दोनों की समरसता ( एकता ) को जाता है वह योगवित् है । मलों के शोधन के लिए चन्द्र और सूर्य का संयोग किया जाता है । अब रसों का सम्यक प्रकार शोषण करने वाली महामुद्रा को कहते हैं । छाती को ठोड़ी से दबाकर और बांयी एड़ी से योनिस्थान को दबाकर तथा फैलाये हुए दूसरे पैर को पकड़ कर, दोनों कुक्षियों को बांधकर भरी हुई श्वास को धीरे-धीरे छोड़े—इसको पापनाशिनी महामुद्रा कहा जाता है ॥५६-६३॥ अथात्मनिर्णयं व्याख्यास्ये—हृदि स्थाने अष्टदलपद्मं वर्तते तन्मध्ये रेखावलयं कृत्वा जीवात्मरूपं ज्योतीरूपमणुमात्रं वर्तते । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं भवति सर्वं जानाति सर्वं करोति सर्वमेतच्च-
ध्यानबिन्दूपनिषत् [२६३]
रितमहं कर्ताऽहं भोक्ता सुखी दुःखी काणः खंजो बधिरो मूकः कृशः स्थूलोऽनेन प्रकारेण स्वतन्त्रवादेन वर्तते । पूर्वदले विश्र- मते पूर्वदलं श्वेतवर्णं तदा भक्तिपुरः सरं धर्मे मतिर्भवति । यदाऽऽग्नेयदले विश्रमते तदाग्नेयदलं रक्तवर्णं तदा निद्रालस्य- मतिर्भवति । यदा दक्षिणदले विश्रमते तद्दक्षिणदलं कृष्णवर्णं तदा द्वेषकोपमतिर्भवति । यदा नैर्ऋतदले विश्रमते तन्नैर्ऋत- दलं नीलवर्णं तदा पापकर्महिंसामतिर्भवति ॥ यदा पश्चिम- दले विश्रमते तत्पश्चिमदलं स्फटिकवर्णं तदा क्रीडा विनोदमति- र्भवति । यदा वायव्यदले विश्रमते वायव्यदलं माणिक्यवर्णं तदा गमन चालनवैराग्यमतिर्भवति । यदोत्तरदले विश्रमते तदुत्तरदलं पीतवर्णं तदा सुखशृङ्गारमतिर्भवति । यदेशानदले विश्रमते तदीशानदलं वैडूर्यवर्णं तदा दानादिकृपामतिर्भवति । यदा संधिसंधिषु मतिर्भवति तदा वातपित्तश्लेष्ममहाव्याधि प्रकोपॊ भवति । यदा मध्ये तिष्ठति तदा सर्वं जानाति गायति नृत्यति पठत्यानन्दं करोति । यदा नेत्रश्रमो भवति श्रमनिर्ह- रणार्थं प्रथमरेखावलयं कृत्वा मध्ये किमज्जनं कुरुते प्रथम- रेखा बन्धूकपुष्पवर्णं तदा निद्रावस्था भवति । निद्रावस्थामध्ये स्वप्नावस्था भवति । स्वप्नावस्थामध्ये दृष्टं श्रुतमनुमानसंभव- वार्ता इत्यादिकल्पनां करोति तदादिश्रमो भवति । श्रमनिर्ह- रणार्थं द्वितीयरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते द्वितीय- रेखा इन्द्रकोपवर्णं तदा सुषुप्त्यावस्था भवति सुषुप्तौ केवल- परमेश्वरसम्बन्धिनी बुद्धिर्भवति नित्यबोधस्वरूपा भवति पश्चा- त्परमेश्वररूपेण प्राप्तिर्भवति । तृतियरेखावलयं कृत्वा मध्ये निमज्जनं कुरुते तृतीयरेखा पद्मरागवर्णं तदा तुरीयावस्था भवति तुरीये केवलपरमात्म संबन्धिनी मतिर्भवति नित्यबोध- स्वरूपो भवति तदा ॥
२६४ ध्यानबिन्दूपनिषत् शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ तदा प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा सर्वं विश्वमात्मस्वरूपेण लक्ष्यं धारयति यदा तुरीयातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरूपो भवति द्वन्द्वातीतो भवति यावद्देहधारणा वर्तते तावत्तिष्ठति पश्चात्परमा- त्मस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति इत्यनेन प्रकारेण मोक्षो भवतीदमेवा- त्मदर्शनोपायं भवति ॥ - चतुष्पथसमायुक्तमहाद्वारगवायुना । सहस्थित त्रिकोणोर्ध्वगमने दृश्यतेच्युतः ॥ ९४ अब आत्मा के निर्णय के विषय में विचार करते हैं । हृदय स्थान में अष्टदल कमल है, उसमें रेखाओं का आश्रय लेकर जीवात्मा ज्योतिरूप अणुमात्र रूप में रहता है । उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है, वही सब कुछ जानता है, सब कुछ करता है । वही ऐसा विचार करता है कि मैं सब चरित्रों का करता हूँ, भोक्ता हूँ, सुखी, दुखी, काना खंज, बहिरा, गूँगा, दुबला, मोटा हूँ। इस प्रकार वह स्वतन्त्रता का व्यवहार करता है। उस कमल का पूर्वदल श्वेत वर्ण का है और उसमें निवास करने से भक्ति और धर्म में मति रहती है । तब आग्नेय दिशा के रक्त वर्ण के दल में निवास होता है तब निद्रा और आलस्य में मति होती है । जब दक्षिण वाले कृष्ण-दल में निवास करते हैं तब द्वेष और कोप की मति होती है । जब नैर्ऋत्य दिशा के नील- वर्ण दल में निवास करता है तब पापकर्म और हिंसा में मति रहती है । जब पश्चिम के स्फटिक वर्ण वाले दल में निवास करता है तब
क्रीड़ा, विनोद में मति रहती है । जब वायव्यकोण के माणिक्य के से रङ्ग वाले दल में निवास करता है तब चलने और वैराग्य की भावना होती है । जब उत्तर के पीतवर्ण दल में निवास करता है तब सुख, शृङ्गार में मति होती है । जब ईशानकोण के वैडूर्यमणि के वर्ण के दल में निवास करता है तब दानादि, कृपा करने में मति रहती है । जब संधियों की संधि में मति रहती है तब वात, पित्त, कफ सम्बन्धी महा- व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति रहती है तब सब जानने गाने, नृत्य करने, पढ़ने, आनन्द करने में लगी रहती है । जब नेत्र को श्रम होता है तो उसे दूर करने के उद्देश्य से प्रथम रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिससे निद्रावस्था होती है । वह प्रथम रेखा बन्धूक पुष्प के रङ्ग वाली है । निद्रावस्था के मध्य में ही स्वप्न अवस्था रहती है । स्वप्न में देखी हुई सुनी हुई, अनुमान की हुई, बातों की कल्पना की जाती है तो उससे श्रम होता है । उस श्रम के दूर करने के हेतु दूसरी रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिसका वर्ण वीर-बहूटी का सा है । तब सुषुप्ति अवस्था होती है जिसमें बुद्धि ईश्वर के सम्बन्ध वाली तथा नित्य बोधरूप होती है, इससे बाद में परमेश्वर की प्राप्ति होती है । जब दूसरी पद्मराग के वर्ण वाली रेखा के मध्य में डुबकी लगाई जाती है तब तुरीयावस्था होती है । तुरीया में बुद्धि परमात्मा से सम्बन्ध वाली और नित्य बोधरूप होती है । तब शनैः शनैः सबसे पृथक होकर धैर्ययुक्त हो मन को आत्मा में स्थित करे और अन्य कुछ भी चिन्तन न करे । तब प्राण अपान में एक्यभाव स्थापित करके समस्त विश्व को आत्मरूप समझते हुये उसी का लक्ष्य रखा जाता है । जब तुरीयातीत अवस्था प्राप्त हो जाती है तब सब आनन्दरूप होकर द्वन्द्वभाव मिट जाता है । इसके पश्चात् प्रारब्ध को पूरा करने की अवधि तक ही जीव देह में ठहरता हैं फिर परमात्मतत्व में मिल जाता है । यही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है और इसी मार्ग से आत्म-दर्शन होता है । चारों