१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८८ ] [ अमृतबिन्दूपनि कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वाऽथ पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेतसि । वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयन्पूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्ति प्रभावान्नरः ॥६६॥ पद्मासनस्थितो योगी नाडीद्वारेषु पूरयन् । मारुतं कुम्भयन्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥७० इस अजपा गायत्री के संकल्प मात्र से मनुष्य पापों से छूट जाता है। न तो इसके समान कोई विद्या है, न जप है, न कोई पुण्य है, न हो सकता है। इसके द्वारा मनुष्य बिना कठिनाई के ब्रह्म-स्थान तक पहुँच जाता है ॥ ६४-६५ ॥ परमेश्वरी-शक्ति उस मार्ग को अपने मुख से ढक कर सोई हुई है। वह वह्नियोग द्वारा जागृत होती है और तब सुषुम्ना में मन और प्राण वायु सहित ऊपर जाती है, उसी प्रकार जैसे सुई तागे को ले जाती है और जैसे ताली से द्वार को खोल लिया जाता है वैसे ही योगी कुण्डलिनी शक्ति द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं ॥ ६६- ६८ ॥ हाथों को सम्पुटित करके, दृढ़तापूर्वक पद्मासन लगाकर, ठोड़ी से उरु प्रदेश को मजबूती से दबाकर, ब्रह्म का चित्त में ध्यान करते हुए, अपान वायु को बारम्बार ऊपर की ओर चलाता हुआ और खींची हुई प्राणवायु को नीचे लेता हुआ साधक कुण्डलिनी शक्ति के प्रभाव को अनुभव करता है ॥ ६९ ॥ जो योगी पद्मासन पर स्थित होकर नाड़ियों में वायु को भर कर कुम्भक द्वारा रोकता है वह निःसंशय रूप से मुक्ति पाता है ॥ ७० ॥ अङ्गानां मर्दन कृत्वा श्रमजातेन वारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरपानरतः सुखी ॥७१ ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः । अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥७२