भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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ध्यानबिन्दूपनिषद् In Public Domain. Digitization by eGangotri २८१ कन्दोर्ध्वकुण्डलीशक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम् । अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः ॥ ७३ युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् । पाष्णिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम् ॥ ७४ अपानमूर्ध्वमुत्कृष्य मूलबन्धोऽयमुच्यते । उड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तंमहाखगः ॥ ७५ उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धो विधीयते । उदरे पश्चिमं ताणं नाभेरुर्ध्वं तु कारयेत् ॥ ७६ श्रम करने से जो पसीना निकले उसे शरीर में ही मल लेना चाहिये; कटु, अम्ल और नमक को त्याग कर दूध का भोजन करना चाहिये । इस प्रकार साधन करने वाला मिताहारी, ब्रह्मचारी योगी एक वर्ष के भीतर सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं ॥७१-७२॥ कन्द के ऊर्ध्वभाग में रहने वाली कुण्डलिनी द्वारा योगी निश्चय रूप से सिद्ध होता है । नियमित रूप से मूलबन्ध का अभ्यास करने से प्राण और अपान की एकता होती है, मल-मूत्र कम हो जाता है और वृद्ध भी युवा हो जाता है । एड़ी से योनि स्थान को दबा कर गुदा को आकुञ्चित करे और अपानवायु को ऊपर की तरफ खींचे । इसको मूलबन्ध कहते हैं । अब उड्डियाण की विधि कहते हैं कि जिस प्रकार महाखग विश्राम करता है उस प्रकार होकर उदर की पश्चिम 'ताण' को नाभि के ऊपर करे ॥७३-७६॥ उड्डियाणोऽप्ययं बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी । बध्नाति हि शिरोजात्मधोगामिनभोजलम् ॥ ७२ ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः । जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ॥ ७८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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