१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति । कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ॥ ७६ भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी । न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा ॥ ८० यह उड्डियाण बन्ध मृत्यु के लिये ऐसा ही है जैसे हाथी के लिए सिंह । अब जालन्धर बन्ध को कहते हैं जिससे शिरोकाश से उत्पन्न होने वाले जल ( अमृत ) को ऊपर ही रोक दिया जाता है और इस प्रकार कर्म बन्धन और क्लेशों को निवारण किया जाता है । जालन्धर बन्ध में कण्ठ का संकोचन किया जाता है जिससे अमृत अग्नि में नहीं गिरता और वायु नहीं दौड़ता । अब खेचरी को बतलाते हैं कि जिह्वा को लोटाकर कपाल कुहर में ले जाय और दोनों भौंहों के मध्य में दृष्टि जमाकर रखे । इसके अभ्यास से रोग और मरण का भय जाता रहता है और निद्रा, भूख, प्यास भी नहीं सताती ॥८०॥ न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम् । पीड्यते न च रोगेण लिप्यते न च कर्मणा ॥ ८१ बध्यते न च कालेन यस्य मुद्राऽस्ति खेचरी । चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा भवति खेगता ॥ ८२ तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा. सिद्धनमस्कृता । खेचर्या मुद्रया यस्य विवरं लम्बि कोर्ध्वतः ॥ ८३ बिन्दुः क्षरति नो यस्य कामिन्यालिङ्गितस्य च । यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः ॥ ८४ यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति । गलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तो योनिमण्डले ॥ ८५