१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंव्रजत्यूर्ध्वं हठाच्छक्त्या निबद्धो योनिमुद्रया । स एव द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा ॥ ८६ पाण्डरं शुक्लम इत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः । विद्रुमद्रुमसंकाशं योनिस्थाने स्थितं रजः ॥ ८७ शशिस्थाने वसेद्विन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् । बिन्दुः शिवो रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः ॥ ८८ जो खेचरी को जानता है उसे मूर्छा नहीं होती, न रोगों से पीड़ित होता है, न कर्मों में लिप्त रहता है। जिसका चित्त खेचरी मुद्रा के साधन से आकाश में रहता है और जिह्वा की आकाशगामिनी होती है वह काल के बन्धन में नहीं पड़ता ॥८१-८२॥ इसलिए इस खेचरी मुद्रा को सिद्ध योगी नमस्कार करते हैं। खेचरी मुद्रा द्वारा जिसने तालू के छेद को बन्द कर लिया है, उसका वीर्य क्षय नहीं होता चाहे वह स्त्री का आलिंगन ही क्यों न करे और जब तक वीर्य देह में स्थित है तब तक मृत्यु का भय कैसा ? ॥८३-८४॥ जब तक खेचरी मुद्रा रहेगी तब तक वीर्य पतन नहीं हो सकता और यदि किसी प्रकार वीर्य स्खलित होकर योनिस्थान में चला भी जाय तो योनिमुद्रा द्वारा उसे शक्तिपूर्वक फिर ऊपर की तरफ खींच लिया जाता है। वह वीर्य श्वेत तथा रक्तवर्ण—दो प्रकार का होता है। श्वेतवर्ण वाला शुक्ल कहा जाता है और लाल रङ्ग वाला महाराज कहलाता है। मूंगे के समान रङ्ग वाला रज (योगी के) योनि स्थान में स्थित है और शुक्ल चन्द्रस्थान में रहता है। उन दोनों का एक होना बड़ा कठिन है। शुक्ल शिव रूप है और रज शक्ति रूप है, वीर्य चन्द्रमा है और रज सूर्य है ॥८५-८८॥ उभयोः संगमादेव प्राप्यते परमं वपुः । वायुना शक्ति चालेन प्रेरितं खे यथा रजः ॥ ८९