भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 300

रविणैकत्वमायाति भवेद्दिव्यवपुस्तदा । शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् ॥ ६० द्वयोः समरसीभावं यो जानाति स योगवित् । शोधनं मलजालानां घटनं चन्द्रसूर्ययोः ॥ ६१ रसानां शोषणं सम्यङ् महामुद्राऽभिधीयते ॥ ६२ वक्षोन्यस्तहनुर्निपीड्य सुषिरं योनेश्च वामाङ्घ्रिणा । हस्ताभ्यामनुधारयन् प्रविततं पादं तथा दक्षिणम् । आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनै रेचये— देषा पातक नाशिनी ननु महामुद्रा नृणां प्रोच्यते ॥ ६३ इन दोनों के संयोग से परम देह प्राप्त होती है । वायु द्वारा शक्ति को चलित करने से जब रज आकाश को प्रेरित होता है और सूर्य के साथ मिल जाता है तब शरीर दिव्य हो जाता है । शुक्ल वर्ण बिन्दु चन्द्रमा से संयुक्त है और रज सूर्य से समन्वित है, जो इन दोनों की समरसता ( एकता ) को जाता है वह योगवित् है । मलों के शोधन के लिए चन्द्र और सूर्य का संयोग किया जाता है । अब रसों का सम्यक प्रकार शोषण करने वाली महामुद्रा को कहते हैं । छाती को ठोड़ी से दबाकर और बांयी एड़ी से योनिस्थान को दबाकर तथा फैलाये हुए दूसरे पैर को पकड़ कर, दोनों कुक्षियों को बांधकर भरी हुई श्वास को धीरे-धीरे छोड़े—इसको पापनाशिनी महामुद्रा कहा जाता है ॥५६-६३॥ अथात्मनिर्णयं व्याख्यास्ये—हृदि स्थाने अष्टदलपद्मं वर्तते तन्मध्ये रेखावलयं कृत्वा जीवात्मरूपं ज्योतीरूपमणुमात्रं वर्तते । तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं भवति सर्वं जानाति सर्वं करोति सर्वमेतच्च-