भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 303

क्रीड़ा, विनोद में मति रहती है । जब वायव्यकोण के माणिक्य के से रङ्ग वाले दल में निवास करता है तब चलने और वैराग्य की भावना होती है । जब उत्तर के पीतवर्ण दल में निवास करता है तब सुख, शृङ्गार में मति होती है । जब ईशानकोण के वैडूर्यमणि के वर्ण के दल में निवास करता है तब दानादि, कृपा करने में मति रहती है । जब संधियों की संधि में मति रहती है तब वात, पित्त, कफ सम्बन्धी महा- व्याधियों का प्रकोप होता है। जब मध्य में मति रहती है तब सब जानने गाने, नृत्य करने, पढ़ने, आनन्द करने में लगी रहती है । जब नेत्र को श्रम होता है तो उसे दूर करने के उद्देश्य से प्रथम रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिससे निद्रावस्था होती है । वह प्रथम रेखा बन्धूक पुष्प के रङ्ग वाली है । निद्रावस्था के मध्य में ही स्वप्न अवस्था रहती है । स्वप्न में देखी हुई सुनी हुई, अनुमान की हुई, बातों की कल्पना की जाती है तो उससे श्रम होता है । उस श्रम के दूर करने के हेतु दूसरी रेखा के मध्य में डुबकी लगाती है जिसका वर्ण वीर-बहूटी का सा है । तब सुषुप्ति अवस्था होती है जिसमें बुद्धि ईश्वर के सम्बन्ध वाली तथा नित्य बोधरूप होती है, इससे बाद में परमेश्वर की प्राप्ति होती है । जब दूसरी पद्मराग के वर्ण वाली रेखा के मध्य में डुबकी लगाई जाती है तब तुरीयावस्था होती है । तुरीया में बुद्धि परमात्मा से सम्बन्ध वाली और नित्य बोधरूप होती है । तब शनैः शनैः सबसे पृथक होकर धैर्ययुक्त हो मन को आत्मा में स्थित करे और अन्य कुछ भी चिन्तन न करे । तब प्राण अपान में एक्यभाव स्थापित करके समस्त विश्व को आत्मरूप समझते हुये उसी का लक्ष्य रखा जाता है । जब तुरीयातीत अवस्था प्राप्त हो जाती है तब सब आनन्दरूप होकर द्वन्द्वभाव मिट जाता है । इसके पश्चात् प्रारब्ध को पूरा करने की अवधि तक ही जीव देह में ठहरता हैं फिर परमात्मतत्व में मिल जाता है । यही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है और इसी मार्ग से आत्म-दर्शन होता है । चारों

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३) · पृष्ठ 303, कुल 572 में से · BharatKosha