१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ ध्यानबिन्दूपनिषत् शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ तदा प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा सर्वं विश्वमात्मस्वरूपेण लक्ष्यं धारयति यदा तुरीयातीतावस्था तदा सर्वेषामानन्दस्वरूपो भवति द्वन्द्वातीतो भवति यावद्देहधारणा वर्तते तावत्तिष्ठति पश्चात्परमा- त्मस्वरूपेण प्राप्तिर्भवति इत्यनेन प्रकारेण मोक्षो भवतीदमेवा- त्मदर्शनोपायं भवति ॥ - चतुष्पथसमायुक्तमहाद्वारगवायुना । सहस्थित त्रिकोणोर्ध्वगमने दृश्यतेच्युतः ॥ ९४ अब आत्मा के निर्णय के विषय में विचार करते हैं । हृदय स्थान में अष्टदल कमल है, उसमें रेखाओं का आश्रय लेकर जीवात्मा ज्योतिरूप अणुमात्र रूप में रहता है । उसी में सब कुछ प्रतिष्ठित है, वही सब कुछ जानता है, सब कुछ करता है । वही ऐसा विचार करता है कि मैं सब चरित्रों का करता हूँ, भोक्ता हूँ, सुखी, दुखी, काना खंज, बहिरा, गूँगा, दुबला, मोटा हूँ। इस प्रकार वह स्वतन्त्रता का व्यवहार करता है। उस कमल का पूर्वदल श्वेत वर्ण का है और उसमें निवास करने से भक्ति और धर्म में मति रहती है । तब आग्नेय दिशा के रक्त वर्ण के दल में निवास होता है तब निद्रा और आलस्य में मति होती है । जब दक्षिण वाले कृष्ण-दल में निवास करते हैं तब द्वेष और कोप की मति होती है । जब नैर्ऋत्य दिशा के नील- वर्ण दल में निवास करता है तब पापकर्म और हिंसा में मति रहती है । जब पश्चिम के स्फटिक वर्ण वाले दल में निवास करता है तब