१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् पथ संयुक्त महाद्वार में जाने वाले वायु के साथ स्थित होकर, अर्ध त्रिकोण में होकर अच्युत दिखाई देता है ॥९४॥ पूर्वोक्तत्रिकोणस्थानादुपरि पृथिव्यादिपञ्चवर्णकं ध्येयम् । प्राणादिपंचवायुश्च बीजं वर्णं च स्थानकम् । यकारं प्राणबीजं च नीलजीमूतसन्निभम् रकारमग्निबीजं च अपानादित्यसंनिभम् ॥ ९५ लकारं पृथिवीरूपं व्यानं बन्धूकसन्निभम् । वकार जीवबीजं च उदानं शङ्खवर्णकम् ॥ ९६ हकारं वियत्स्वरूपं च समानं स्फटिकप्रभम् । हृन्नाभि नासिकाकण्ठपादांगुष्ठादिसंस्थितः ॥ ९७ द्विसप्ततिसहस्राणि नाडिमार्गेषु वर्तते । अष्टाविंशतिकोटीषु रोमकूपेषु संस्थितः ॥ ९८ समानप्राण एकस्तु जीवः स एक एव हि । रेचकादित्रयं कुर्याद्दृढचित्तः समाहितः ॥ ९९ शनैः समस्तमाकृष्य हृत्सरोरुहकोटरे । प्राणापानौ च बध्वा तु प्रणवेन समुच्चरेत् ॥ १०० पूर्वोक्त त्रिकोण स्थान के ऊपर पांच वर्ण वाले पृथिवी आदि तत्व ध्यान करने योग्य हैं । बीज, वर्ण और स्थान वाले पांच वायु ध्यान करने योग्य हैं । 'य'कार वायु रूप प्राण का बीज है जो नीले बादल के तुल्य है । 'र'कार आदित्य रूप अपान का बीज है ॥९५॥ 'ल'कार पृथ्वी रूप का ध्यान बन्धूक पुष्प के वर्ण