१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंध्यानबिन्दूपनिषत् [ २९७ फा है। 'व'कार शङ्ख के वर्ण का जलरूप उदान का बीज है ॥९६॥ 'ह'कार स्फटिक वर्ण का आकाश के समान है। हृदय, नाभि, नासिका, कान और पैर का अंगूठा समान के स्थान हैं ॥९७॥ यह समान वायु बहत्तर हजार नाड़ियों में तथा शरीर के रोम कूपों तक में रहती है ॥९८॥ समान और प्राण एक ही है, वही एक जीव है। चित्त को भली प्रकार समाहित करके, रेचक, कुम्भक तीनों करे । सब को शनैः-शनैः खींचकर हृदय कमल के कोटर में प्राणवायु और अपानवायु को रोककर प्रणव का उच्चारण करे ॥१००॥ कण्ठसंकोचनं कृत्वा लिङ्गसंकोचनं तथा । मूलाधारात्सुषुम्ना च बिसतन्तुनिभा शुभा ॥ १०१ अमूर्तो वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । शङ्खनादादिभिश्चैव मध्यमेव ध्वनिर्यथा ॥ १०२ व्योमरन्ध्रगतो नादो मायूरं नादमेव च । कपालकुहरे मध्ये चतुर्द्वारस्य मध्यमे ॥ १०३ यदात्मा राजते तत्र यथा व्योम्नि दिवाकरः । कोदण्डद्वयमध्ये तु ब्रह्मरन्ध्रे तु शक्ति च ॥ १०४ स्वात्मानं पुरुषं पश्येन्मनस्तत्र लय गतम् । रत्नानि ज्योतिस्ननादं तु बिन्दु माहेश्वरं पदम् ॥ १०५ य एवं वेद पुरुषः स कैवल्यं समुश्नुते ॥ १०६ इत्युपनिषत् ॥ कण्ठ और लिंग का संकोचन करे, फिर मूलाधार से पद्मतंतु के समान निकलने वाली सुषुम्ना का संकोचन करे ॥१०१॥ वीणा