१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ
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२६८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् से उठने वाला अमूर्तं नाद जान पड़ता है, उसी के मध्य में शङ्ख आदि के समान ध्वनि होती है ॥१०२॥ कपाल कुहर के मध्य में चारों द्वारों का मध्य-स्थान है, वहाँ आकाशरन्ध्र में से जाता हुआ नाद मोर के शब्द के तुल्य होता है ॥१०३। जैसे आकाश में सूर्य है वैसे ही यहाँ विराजमान है और ब्रह्मरन्ध्र में दो कोदण्ड के मध्य शक्ति विराजमान है ॥१०४॥ वहाँ पुरुष अपने मन को लय करके स्वात्मा को देखे, वहाँ रत्नों की ज्योति रूप नाद विन्दु महेश्वर का पद है । जो इसको जानता है वह कैवल्य को प्राप्त करता है । यह उपनिषद है ॥१०५-१०६॥ ॥ ध्यानबिन्दूपनिषद समाप्त ॥