१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०० ] [ अक्षमालिकोपनिषत् यदस्यान्तरं सूत्रं तद्ब्रह्म । यद्दक्षपार्श्वं तच्छैवम् । यद्वामे तद्वैष्णवम् । यन्मुखं सा सरस्वती । यत् पुच्छं सा गायत्री । यत् सुषिरं सा विद्या । या ग्रन्थिः सा प्रकृतिः । ये स्वरास्ते धवलाः । ये स्पर्शास्ते पीताः । ये परास्ते रक्ताः ॥३॥ किसी समय प्रजापति ने गुह से पूछा—हे भगवन् ! अक्षमाला की भेद-विधि को कहिए। उसका क्या लक्षण है ? कितने भेद हैं ? इसके कितने सूत्र हैं ? कैसे घटना प्रकार है ? ( पिरोने का प्रकार ) कौन अक्षर हैं ? क्या प्रतिष्ठा है ? और कौन इसका अधिदेवता है ? और क्या फल है ? ॥ १ ॥ तब उन्हें गुह ने उत्तर दिया—प्रबाल, मोती, स्फटिक, शंख, चांदी, सोना चंदन, पुत्र जीविका, कमल तथा रुद्राक्ष ये दस प्रकार की होती है जो कि अ से लेकर क्ष तक के अक्षरों से अनुभावित करके धारण की जाती है। इसमें सोना, चांदी तथा तांबा ये तीन सूत्र होते हैं। उस ( मणके ) के छेद में सोना, दाहिने भाग में चाँदी तथा बाँये हिस्से में तांबा, उसके मुख में मुख, पूँछ स्थान में पूँछ उसके अन्दर का सूत्र है वह ब्रह्मा है। जो दाहिने भाग में है वह शैव है। जो बायें हिस्से में है वह वैष्णव है। जो मुख है वह सरस्वती है जो पूँछ है। वह गायत्री है । जो छेद है वह विद्या है। जो गांठ है यह प्रकृति है। जो स्वर है वह सात्विक होने के कारण धवल अर्थात् सफेद है तथा जो स्पर्श है वह सत्व तथा तम मिश्रित होने के कारण पीले हैं एवं जो पर हैं वे राजस के कारण लाल हैं ॥ ३ ॥ अथ तां पञ्चभिर्गव्यैरमृतैः पञ्चभिर्गव्यैस्तनुभिः शोध- यित्वा पञ्चभिर्गव्यैर्गन्धोदकेन तस्नाप्य तुस्मात् सोङ्कारेण पत्र-