१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षमालिकोपनिषत् [ ३०१: कूर्चेन स्नपयित्वाऽष्टभिर्गन्धैराषिच्य सुमनःस्थले निवेश्याक्षत- पुष्पैराराध्य प्रत्यक्षमादिक्षान्तवर्णैर्भावयेत् ॥४॥ ओमंकार मृत्युञ्जय सर्वव्यापक प्रथमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमांक आकर्षणात्मक सर्वगत द्वितीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमिंकार पुष्टिदाक्षोभकर तृतीयेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमींकार वाक्प्रसादकर निर्मल चतुर्थेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमुंकार सर्वबलप्रद सारतर पञ्च- मेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमूॅकारोच्चाटनकर दुःसह षष्ठेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्ॄकार संक्षोभकर चञ्चल सप्तमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्ॄंकार सम्मोहनकरोज्ज्वलाष्टमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लूंकार विद्वेषणकर शूहक नवमेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओम्लॄंकार मोहकर दशमेऽक्षे प्रति- तिष्ठ । ओमेंकार सर्ववश्यकर शुद्धसत्त्वैकादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमैकार शुद्धसात्विक पुरुषवश्यकर द्वादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमों- काराखिलवाङ्मय नित्यशुद्ध त्रयोदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमौंकार सर्ववाङ्मय वश्यकर शान्त चतुर्दशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमंकार गजादिवश्यकर मोहन पञ्चदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओमःकार मृत्यु- नाशनकर रौद्र षोडशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं कंकार सर्वविषहर कल्याणद सप्तदशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं खंकार सर्वक्षोभकर व्याप- काष्टादशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं गंकार सर्वविघ्नशमन महत्तरैको- नविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं घंकार सौभाग्यद स्तरम्भनकर विंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं ङंकार सर्वविषनाशकरोग्रैकविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं चंकाराभिचारघ्न क्रूर द्वाविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं छंकार भूतनाशकर भीषण त्रयोविंशेऽक्षे प्रतितिष्ठ । ओं जंकार