१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०४ ] [ अक्षमालिकोपनिषत्. वाले तथा चंचल हो इस सातवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ॠंकार ! तुम सम्मोहन करने वाले तथा उज्ज्वल हो इस आठवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लृंकार ! तुम विद्वेष को उत्पन्न कर देने वाले तथा सब कुछ जानने वाले अत्यन्त गुप्त हो इस नवे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे लॄंकार ! तुम मोहकारी हो इस दसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे एंकार ! तुम सब को वश में करने वाले तथा शुद्ध सत्य हो इस ग्यारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ऐंकार ! तुम शुद्ध तथा सात्विक हो और पुरुषों को वश में करने वाले हो इस बारहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे ओंकार ! तुम अखिल वाङ्मय (सारे ही अक्षरों के समूह) हो एवं नित्य शुद्ध हो इस तेरहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे औंकार ! तुम भी अक्षर समूह स्वरूप वश में करने वाले तथा शान्त हो इस चौदहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे अंकार ! हाथी आदमियों को वश में करने वाले एवं मोहित करने वाले हो इस पन्द्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे अःकार ! तुम मृत्यु नाशक तथा रौद्र (अत्यन्त भयानक) हो इस सोलहवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ। हे कंकार ! तुम सभी विषों को हरने वाले तथा कल्याण देने वाले हो इस सत्रहवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे खंकार ! तुम सबको क्षुभित करने वाले एवं व्यापक हो इस अठ्ठारहवें अक्ष में प्रति- ष्ठित हो जाओ। ओं हे गंकार ! तुम सभी विघ्नों को शान्त करने वाले तथा बड़ों में भी बड़े (विशाल) हो इस उन्नीसवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ। ओं हे घंकार ! तुम सौभाग्य देने वाले तथा स्तम्भन (गति को रोकने वाले) कर्त्ता हो बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठा पाओ) ओं हे ङंकार ! तुम सभी विषों के नाशक तथा उग्र भयानक हो इस इक्कीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे चंकार ! तुम Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi