१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०५
अभिचार नाशक तथा क्रूर हो बाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे छंकार ! तुम भूत नाशक तथा भयानक हो तेईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे जंकार ! तुम कृत्या आदि ( डाकिनी आदि ) नाशक तथा दुर्धर्ष हो इस चौबीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे झंकार ! तुम भूतनाशक हो इस पच्चीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ञंकार ! तुम मृत्यु को मथित कर देने वाले हो इस छब्बीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे टंकार ! तुम सभी रोगों के नाशक तथा सौम्य हो इस सत्ताईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे ठंकार ! तुम चन्द्रस्वरूप हो इस अठ्ठाईसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे डंकार ! तुम गरुड़ स्वरूप विषनाशक तथा सुन्दर हो उनतीसवें में प्रति- ष्ठित हो जाओ । ओं हे ढंकार ! तुम सभी तरह की सम्पत्ति- दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । दायक तथा सौम्य हो इस तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे णंकार ! तुम सभी सिद्धि देने वाले तथा मोह कर देने वाले हो इस इकत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे तंकार ! तुम धनधान्य आदि सम्पत्तिदाता तथा सदा प्रसन्न हो इस बत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे थंकार ! तुम धर्म की प्राप्ति कराने वाले तथा निर्मल हो इस तेतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे दंकार ! तुम पुष्टि तथा वृद्धिकर्ता हो तथा सुन्दर दीखने वाले हो इस चौंतीसवें अक्ष प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे धंकार ! तुम विष तथा ज्वर के नाशक हो तथा विशाल ( बहुत ) हो इस पैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे नंकार तुम भोग तथा मोक्षदाता तथा शान्त हो इस छत्तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे पंकार ! तुम विष एवं विघ्नों के नाशक तथा कल्याणमय हो इन सैंतीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ । ओं हे फंकार ! तुम अणिमा महिमा गरिमा आदि आठ सिद्धि के