१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०६ ] [ अक्षमालिकोपनिषत् तथा प्रकाश स्वरूप हो, इस अड़तीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे बंकार ! तुम सब दोषों को हरण करने वाले तथा सुन्दर हो, इस उनतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे भंकार ! तुम भूत बाधा शान्त करने वाले तथा भयानक हो, इस चालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे मंकार ! तुम विद्वेष (बैर) करने वाले को मोहित करने वाले अथवा विद्वेषी तथा मोह करने वाले हो, इस इकतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे यंकार ! तुम सब जगह व्यापी तथा पवित्र हो, इस बयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। हे रंकार ! तुम दाह (जलन) (तपन) उत्पन्न करने वाले तथा विकृत हों, इस तेतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे लकार ! तुम विश्व का पोषण करने वाले तथा तेजस्वी (चमकने वाले) हो, इस चौवालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे वंकार ! तुम सब को तृप्त (पुष्ट) करने वाले तथा निर्मल हो इस पैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ॐ हे शंकार ! तुम सभी प्रकार के फलों के दाता एवं पवित्र हो इस छयालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे षंकार ! तुम धर्म अर्थ तथा काम को देने वाले तथा श्वेत (सात्त्विक) हो, इस सैंतालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे संकार ! तुम सब वस्तुओं के कारण सभी वर्गों से सम्बन्धित इस अड़तालीसवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे हंकार ! तुम सभी सर्व वाङ्मय (सब अक्षरों के या साहित्य के स्वरूप) तथा निर्मल हो, इस उनचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे ळंकार ! तुम सभी शक्तियों के दाता तथा प्रधान (प्रमुख) हो, इस पचासवें अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ। ओं हे क्षंकार ! तुम परात्पर तत्व के बताने वाले तथा परंज्योती स्वरूप हो, इस शिखा मणि में मेरुमाला का प्रधान मणका, प्रतिनिधि रूप से स्थित हो जाओ ॥५॥