१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें'अक्षमालिकोपनिषत् ] [ ३०७ अथोवाच ये देवाः पृथिवीषदस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनु- 'मदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ॥६ अथोवाच ये देवा अन्तरिक्षसदस्तेभ्य ॐ नमो भगवन्तो- 'ऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।७। अथोवाच ये देवा दिविषहस्तेभ्यो नमो भगवन्तोऽनुमदन्तु शोभायै पितरोऽनमदन्तु शोभायै ज्ञानमयीमक्षमालिकाम् ।८। अथोवाच ये मन्त्रा या विद्यास्तेभ्यो नमस्ताभ्यश्चोन- मस्तच्छक्तिरस्याः प्रतिष्ठापयति ।६। अथोवाच ये ब्रह्मविष्णुरुद्रास्तेम्य सगुणेभ्यः ओं नमस्त- 'द्दीर्यमस्याः प्रतिष्ठापयति ॥१० वे इस प्रकार बोले — 'जो देवता पृथिवी में विचरने वाले हैं उन्हें नमस्कार है। हे भगवन् ! आप लोग इस माला में स्थित हो, इस माला का अनुमोदन (मेरे द्वारा ग्रहण का समर्थन करें) तथा इसकी शोभा के लिए पितृगण ही अनुमोदन करें। इस ज्ञानमयी अक्षमालिका को प्राप्त कर अग्निष्वात्त आदि पितर अनुमोदन करें ॥ ६ ॥ पुनः बोले — 'जो देवता आकाश में रहने वाले हैं, उन्हें नमस्कार है, वे भगवान् पितरों के सहित इसे ज्ञानमयी माला में स्थित हो, इसकी शोभा के लिए अनमोदन करे ॥ ७ ॥ जो देवता स्वर्ग में (आकाश में) निवास करने वाले हैं, वे ज्ञान स्वरूपिणी अक्षमालिका में स्थित हो, वरदान दायक बनकर पितरों सहित इसकी शोभा के लिए अनुमोदन करें ॥ ८ ॥ पुनः इस प्रकार कहे — 'इस लोक में जो सात करोड़ संख्यक मन्त्र हैं, जो चौंसठ कला स्वरूप 'विद्यायें हैं, उन्हें नमस्कार है। उनकी शक्तियां इसमें विराजमान होवें