१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् समान् स्निग्धान् दृढान् स्थूलान् क्षौमसूत्रेण धारयेत् ॥ १५ ॥ सफेद रुद्राक्षों को ब्राह्मण, लाल रुद्राक्षों को क्षत्रिय, पीले रङ्ग वालों को वैश्य तथा कालों को शूद्र कहा है ॥११॥ ब्राह्मण को सफेद, क्षत्रिय को लाल, वैश्य को पीले तथा शूद्र को काले रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ॥१२॥ बराबर ( गोल ), चिकने, मजबूत, बड़े ( मोटे ) तथा कांटे वाले शुभ माने गये हैं। कीड़े के खाये हुए, छिन्न-भिन्न ( जो टूटे हों, खण्ड २ हों ) कांटों से रहित हों, छेद वाले हों, ठीक न लगते हों— इन छः प्रकार के रुद्राक्षों को छोड़ देना चाहिये । अपने आप ( स्वतः ) जिसमें छेद हो ऐसा रुद्राक्ष उत्तम माना जाता है ॥१३-१४॥ जिसमें छेद करना पड़े वह मध्यम होता है । सो एक जैसे चिकने, मजबूत मोटे- मोटे रुद्राक्षों को रेशमी धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए ॥१५॥ सर्वगात्रेण सौम्येन सामान्यानि विचक्षणः । निकषे हेमरेखाभा यस्य रेखा प्रदृश्यते ॥ १६ तदक्षमुत्तमं विद्यात् तद्धार्यं शिवपूजकैः । शिखायामेकरुद्राक्षं त्रिंशत शिरसा वहेत् ॥ १७ षट्त्रिंशतं गले दध्याद्बाह्वोः षोडशषोडश । मणिबन्धे द्वादशैव स्कन्धे पंचशतं वहेत् ॥ १८ अष्टोत्तरशतैर्मालामुपवीतं प्रकल्पयेत् । द्विसरं त्रिसरं वाऽपि सराणां पंचकं तथा ॥ १६ सराणां सप्तकं वाऽपि बिभृयात् कण्ठदेशतः । मुकुटे कुण्डले चैव कर्णिकाहारकेऽपि वा ॥ २० ये रुद्राक्ष सभी प्रकार से सौम्य सुन्दर एक जैसे होने चाहिए ।