१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३१५ सांण पर जिसकी रेखा सुनहरी प्रतीत हो उसको उत्तम समझना चाहिये तथा शिव भक्तों को ( पूजकों को ) वही धारण करना चाहिए । चोटी में एक रुद्राक्ष तथा शिर पर ( माला में पिरोकर ) तीस रुद्राक्षों को धारण करना चाहिए ॥१६-१७॥ गले में छत्तीस तथा दोनों भुजाओं में सोलह-सोलह तथा मणिबन्ध गट्टा ( पंजे के प्रारम्भ के हिस्से ) में बारह तथा कन्धे में पन्द्रह रुद्राक्ष धारण करने चाहिये ॥१८॥ एक सौ आठ रुद्राक्षों की माला बनाकर गले में उपवीत रूप में ( जैसे मालायें पहनी जाती हैं ) धारण करें ( बनावे ) । दो लड़ी, तीन लड़ी, अथवा पाँच लड़ी किंवा सात लड़ियों को कण्ठ देश में धारण करना चाहिये । मुकुट, कुण्डल तथा कान की बाली ( अथवा हार रूप में ) भी धारण करने चाहिये ॥१९-२०॥ केयूरकटके सूत्रं कुक्षिबन्धे विशेषतः । सुप्ते पीते सदाकालं रुद्राक्षं धारयेन्नरः ॥ २१ त्रिशतं त्वधमं पञ्चशतं मध्यममुच्यते । सहस्रमुत्तमं प्रोक्तमेवं भेदेन धारयेत् ॥ २२ शिरसीशानमन्त्रेण कण्ठे तत्पुरुषेण तु । अघोरेण गले धार्यं तेनैव हृदयेऽपि च ॥ २३ अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत् सुधीः । पञ्चाशदक्षग्रथितान् व्योमव्याप्यभिचोदरे ॥ २४ पंच ब्रह्मभिरंगैश्च त्रिमाला पंच सप्त च । ग्रथित्वा मूलमन्त्रेण सर्वाण्यक्षाणि धारयेत् ॥ २५ बाजूबन्द, कुक्षिबन्ध में भी विशेष रूप से सूत्र को ( सूत्र में बँधी माला को ) सोते जागते हुये हमेशा धारण करना चाहिये ॥२१॥