१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 325, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३१७ उसके स्वरूप को मुखों के भेद से अरिष्ट [ अमङ्गल ] दूरीकरण तथा इच्छित वस्तुओं के फल को कहो अर्थात् किन से क्या इच्छित वस्तुएं मिलती हैं ? ) ।।२६।। इसके सम्बन्ध में इस प्रकार श्लोक हैं—एक मुँह वाला रुद्राक्ष परतत्व का स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण करने से इन्द्रियों को वश में करने वाला उस परात्पर ( अन्तिम ) तत्व में ( शिव ) लीन हो जाता है ।।२७।। हे मुनिश्रेष्ठ ! दो मुँह वाला रुद्राक्ष अर्धनारीश्वर का स्वरूप समझा जाता है, उसको धारण करने वाले पर हमेशा अर्धनीश्वर भगवान् ( शिव ) प्रसन्न होते हैं ।।२८।। तीन मुँह वाला रुद्राक्ष तीनों अग्नियों का स्वरूप समझा जाता है । उसे धारण करने से उस पर हमेशा अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं ॥२६॥ चार मुख वाला रुद्राक्ष चतुर्मुख भगवान का स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण करने से चतुर्मुख भगवान् उस पर प्रसन्न होते हैं ।।३०।। पंचवक्त्रं तु रुद्राक्षं पंचब्रह्मस्वरूपकम् । पंचवक्त्रः स्वयं ब्रह्म पुंहत्यां च व्यपोहति ॥ ३१ षड्वक्त्रमपि रुद्राक्षं कार्तिकेयाधिदैवतम् । तद्धारणान्महाश्रीः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ३२ मतिविज्ञानसंपत्तिशुद्धये धारयेत् सुधीः । विनायकाधिदैवं च प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३३ सप्तवक्त्रं तु रुद्राक्षं सप्तमात्रधिदैवतम् । तद्धारणान्महाश्रोः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् ॥ ३४ महती ज्ञानसंपत्तिः शुचिर्धारयतः सदा । अष्टवक्त्र तु रुद्राक्षमष्टमात्रधिदैवतम् ॥ ३५ वस्वष्टकप्रियं चैव गङ्गाप्रीतिकरं तथा । तद्धारणादिमे प्रीता भवेयुः सत्यवादिनः ॥ ३६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi