भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३१८ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् पांच मुँह वाला रुद्राक्ष पञ्चमुखी भगवान् का (शिव) स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण करने से स्वयं ब्रह्म स्वरूप पञ्चमुखी भगवान् पुरुष हत्या को दूर करते हैं ॥३१॥ छः मुँह वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय (शिव के बड़े पुत्र) का स्वरूप समझा जाता है । उसे धारण करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती है तथा आरोग्य की सुन्दर प्राप्ति होती है । इसे विद्वान लोग गणेश का स्वरूप भी मानते हैं तथा इसे बुद्धि, विद्या, लक्ष्मी की वृद्धि के लिये चतुर मनुष्य को धारण करना चाहिये ॥३२-३३॥ सात मुँह वाला रुद्राक्ष सप्तलोक माताओं (ब्राह्मी आदि) का स्वरूप वाला समझा जाता है, इसे धारण करने से अत्यन्त वैभव की तथा उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है ॥३४॥ पवित्रता से धारण करने पर महान् ज्ञान उत्पन्न होता है । आठ मुँह वाला रुद्राक्ष अष्ट माताओं का स्वरूप समझा जाता है तथा यह अष्ट वस्तुओं का भी प्रिय है तथा इससे गङ्गा भी प्रसन्न होती है । इसे धारण करने से तीनों स्वरूप प्रसन्न होते हैं ॥३५-३६॥ नववक्त्रं तु रुद्राक्षं नवशक्त्यधिदैवतम् । तस्य धारणमात्रेण प्रीयन्ते नव शक्तयः ॥ ३७ दशवक्त्रं रुद्राक्षं यमदैवमुदाहृतम् । दर्शनात् प्रशान्तिजनकं धारणात्रात्र संशयः ॥ ३८ एकादशमुखं त्वक्षं रुद्रैकादशदैवतम् । तदिदं दवतं प्राहुः सदा सौभाग्यवर्धनम् ॥ ३६ रुद्राक्षं द्वादशमुखं महाविष्णुस्वरूपकम् । द्वादशादित्यरूपं च बिभर्त्येव हि तत्परः ॥ ४० नौ मुँह वाले रुद्राक्ष की नौ शक्तियां देवता समझी जाती हैं