१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३१६ ( अर्थात् उनका बोधक है ) इसे धारण करने से नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं । ॥३७॥ दस मुख वाले रुद्राक्ष का देवता यम समझा जाता है । देखने मात्र से शान्ति उत्पन्न करने वाला तथा धारण करने से भी महाशान्ति देने वाला होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥३८॥ ग्यारह मुँह वाले रुद्राक्ष के देवता एकादश रुद्र समझे जाते हैं । यह एकादश रुद्राधिदैवत रुद्राक्ष हमेशा सौभाग्य बढ़ाने वाला होता है ॥३६॥ बारह मुँह वाला रुद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप समझा जाता है । यह बारह सूर्यों का स्वरूप भी समझा जाता है तथा इनका उपासक इसे धारण करता है ॥४०॥ त्रयोदशमुखं चाक्षं कामदं सिद्धिदं शुभम् । तस्य धारणमात्रेण कामदेवः प्रसोदति ॥ ४१ चतुर्दशमुखं चाक्षं रुद्रनेत्रसमुद्भवम् । सर्वव्याधिहरं चैव सर्वदाऽऽरोग्यमाप्नुयात् ॥ ४२ मद्यं मांसं च लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च । श्लेष्मातकं विड्वराहमभक्ष्यं वर्जयेन्नरः ॥ ४३ ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि च । दर्शेषु पूर्णमासे च पूर्णेषु दिवसेषु च । रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४४ रुद्राक्षमूलं तद्ब्रह्मा तन्नालं विष्णुरेव च । तन्मख रुद्र इत्याहुस्तद्विन्दुः सर्वं देवता । इति ॥ ४५ अथ कालाग्निरुद्रं भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छाधीहि भग- वन् रुद्राक्षधारणविधिम् । तस्मिन् समये निदाघजड़भरतदत्ता- त्रेयाकात्यायनभरद्वाजकपिलवसिष्ठपिप्पलादयश्च कालाग्निरुद्रं