१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
३१८ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् पांच मुँह वाला रुद्राक्ष पञ्चमुखी भगवान् का (शिव) स्वरूप समझा जाता है, उसे धारण करने से स्वयं ब्रह्म स्वरूप पञ्चमुखी भगवान् पुरुष हत्या को दूर करते हैं ॥३१॥ छः मुँह वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय (शिव के बड़े पुत्र) का स्वरूप समझा जाता है । उसे धारण करने से महालक्ष्मी प्रसन्न होती है तथा आरोग्य की सुन्दर प्राप्ति होती है । इसे विद्वान लोग गणेश का स्वरूप भी मानते हैं तथा इसे बुद्धि, विद्या, लक्ष्मी की वृद्धि के लिये चतुर मनुष्य को धारण करना चाहिये ॥३२-३३॥ सात मुँह वाला रुद्राक्ष सप्तलोक माताओं (ब्राह्मी आदि) का स्वरूप वाला समझा जाता है, इसे धारण करने से अत्यन्त वैभव की तथा उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती है ॥३४॥ पवित्रता से धारण करने पर महान् ज्ञान उत्पन्न होता है । आठ मुँह वाला रुद्राक्ष अष्ट माताओं का स्वरूप समझा जाता है तथा यह अष्ट वस्तुओं का भी प्रिय है तथा इससे गङ्गा भी प्रसन्न होती है । इसे धारण करने से तीनों स्वरूप प्रसन्न होते हैं ॥३५-३६॥ नववक्त्रं तु रुद्राक्षं नवशक्त्यधिदैवतम् । तस्य धारणमात्रेण प्रीयन्ते नव शक्तयः ॥ ३७ दशवक्त्रं रुद्राक्षं यमदैवमुदाहृतम् । दर्शनात् प्रशान्तिजनकं धारणात्रात्र संशयः ॥ ३८ एकादशमुखं त्वक्षं रुद्रैकादशदैवतम् । तदिदं दवतं प्राहुः सदा सौभाग्यवर्धनम् ॥ ३६ रुद्राक्षं द्वादशमुखं महाविष्णुस्वरूपकम् । द्वादशादित्यरूपं च बिभर्त्येव हि तत्परः ॥ ४० नौ मुँह वाले रुद्राक्ष की नौ शक्तियां देवता समझी जाती हैं
रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३१६ ( अर्थात् उनका बोधक है ) इसे धारण करने से नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं । ॥३७॥ दस मुख वाले रुद्राक्ष का देवता यम समझा जाता है । देखने मात्र से शान्ति उत्पन्न करने वाला तथा धारण करने से भी महाशान्ति देने वाला होता है, इसमें सन्देह नहीं ॥३८॥ ग्यारह मुँह वाले रुद्राक्ष के देवता एकादश रुद्र समझे जाते हैं । यह एकादश रुद्राधिदैवत रुद्राक्ष हमेशा सौभाग्य बढ़ाने वाला होता है ॥३६॥ बारह मुँह वाला रुद्राक्ष महाविष्णु का स्वरूप समझा जाता है । यह बारह सूर्यों का स्वरूप भी समझा जाता है तथा इनका उपासक इसे धारण करता है ॥४०॥ त्रयोदशमुखं चाक्षं कामदं सिद्धिदं शुभम् । तस्य धारणमात्रेण कामदेवः प्रसोदति ॥ ४१ चतुर्दशमुखं चाक्षं रुद्रनेत्रसमुद्भवम् । सर्वव्याधिहरं चैव सर्वदाऽऽरोग्यमाप्नुयात् ॥ ४२ मद्यं मांसं च लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च । श्लेष्मातकं विड्वराहमभक्ष्यं वर्जयेन्नरः ॥ ४३ ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि च । दर्शेषु पूर्णमासे च पूर्णेषु दिवसेषु च । रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४४ रुद्राक्षमूलं तद्ब्रह्मा तन्नालं विष्णुरेव च । तन्मख रुद्र इत्याहुस्तद्विन्दुः सर्वं देवता । इति ॥ ४५ अथ कालाग्निरुद्रं भगवन्तं सनत्कुमारः पप्रच्छाधीहि भग- वन् रुद्राक्षधारणविधिम् । तस्मिन् समये निदाघजड़भरतदत्ता- त्रेयाकात्यायनभरद्वाजकपिलवसिष्ठपिप्पलादयश्च कालाग्निरुद्रं
३२० ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् परिसमेत्योचुः । अथ कालाग्निरुद्रः किमर्थं भवतामागमनमिति होवाच । रुद्राक्षधारणविधिं वै सर्वे श्रोतुमिच्छामह इति ॥ ४६ ॥ अथ कालाग्निरुद्रः प्रोवाच । रुद्रस्य नयनादुत्पन्ना रुद्राक्षा इति लोके ख्यायन्ते । अथ सदाशिवः संहारकाले संहारं कृत्वा संहाराक्षं मुकुलीकरोति । तन्नयनाज्जाता रुद्राक्षा इति होवाच । तस्माद्रुद्राक्षत्वमिति कालाग्निरुद्रः प्रोवाच ॥ ४७ तेरह मुँह वाला रुद्राक्ष इच्छाओं तथा सिद्धियों को देने वाला होता है । इसे धारण करने मात्र से कामदेव प्रसन्न होते हैं । यह शुभ होता है ॥४१॥ चौदह मुँह वाला रुद्राक्ष भगवान् रुद्र की आँखों से विशेष रूप से उत्पन्न हुआ है। यह सब रोगों को हरण ( दूर ) करने वाला तथा परम आरोग्य का दायक होता है ॥४२॥ शराब, मांस, लहसुन, प्याज, सहजन, लसौड़ा विड्वराह ( शाकविशेष ) आदि अभक्ष्य वस्तुओं को इसके धारण करने वाले को छोड़ देना चाहिये ॥४३॥ ग्रहण के समय, जिन दिनों रात तथा दिन बराबर होते हैं (अर्थात् तुला तथा मेष संक्रान्ति ( सूर्य की) के दिनों में, अयन परिवर्तन के समय, अमावस्या पौर्णमासी ( मास समाप्ति पर ) जब दिन पूर्ण हो जाय तब रुद्राक्ष धारण करने से शीघ्र पापमुक्त हो जाता है ॥४४॥ रुद्राक्ष का मूल भाग ब्रह्मा तथा नाल भाग ( छेद ) विष्णु तथा मुख का भाग रुद्र तथा रुद्राक्ष के बिन्दु सब देवता कहे गये हैं ॥४५॥ इसके बाद भगवान कालाग्नि रुद्र को सनत्कुमार ने पूछा ( कहा ) महाराज ! आप रुद्राक्ष धारण करने की विधि बतलाइये । इसी समय निदाघ, जड़ भरत, दत्तात्रेय, कात्यायन, भारद्वाज, कपिल, वशिष्ठ, पिप्पलाद, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
[Page Header] रुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३२१
[Main Text] आदि कालाग्नि रुद्र के चारों तरफ बैठ गये तथा भगवान कालाग्नि रुद्र के यह पूछे जाने पर कि आप लोग क्यों आये हैं ? बोले—हम सब रुद्राक्ष धारण की विधि को सुनना चाहते हैं ॥४६॥ तब कालाग्नि रुद्र बोले—रुद्र के नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण से यह रुद्राक्ष नाम से प्रसिद्ध है। भगवान सदा शिव संहार के समय ( प्रलय काल में ) संहार करके अपने संसार का संहार करने वाले नेत्र को मुकुलित कर लेते हैं ( जरा से खुले तथा अधिकतया बन्द ) उन्हीं से उत्पन्न रुद्राक्ष है । यही रुद्राक्ष का अपना स्वत्व है । इस प्रकार कालाग्नि ने उत्तर दिया ॥४७॥
तद्रुद्राक्षे वाग्विषये कृते दशगोप्रदानेन यत् फलमवाप्नोति तत् फलमश्नुते । स एव भस्मज्योती रुद्राक्ष इति । तद्रुद्राक्षं करेण स्पृष्ट्वा धारणमात्रेण द्विसहस्रगोप्रदानफलं भवति । तद्रु- द्राक्षं कर्णयोर्धार्यमाणे एकादशसहस्रगोप्रदानफलं भवति । एका- दशरुद्रत्वं च गच्छति । तद्रुद्राक्षे शिरसि धार्यमाणे कोटिगो- प्रदानफलं भवति । एतेषां स्थानानां कर्णयोः फलं वक्तुं न शक्यमिति होवाच ॥ ४८
य इमां रुद्राक्षजाबालोपनिषदं नित्यमधीते बालो वा युवा वा वेद स महान् भवति । स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवति । एतैरेव होमं कुर्यात् । एतैरेवार्चनम् । तथा राक्षोघ्नं मृत्युतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नोत । सप्त- द्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते । तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात् सा दक्षिणा भवति । य इमामुपनिषदं ब्राह्मणः पातर- धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधियानो दिवसकृतपापं
३२२ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् नाशयति । मध्याह्नेऽधीयानः षड्जन्मकृतषापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽनेकजन्मकृतपापं नाशयति षट्सहस्रलक्षगायत्री- जपफलमवाप्नोति ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरुदारगमनतत्सं- योगपातकेभ्यः पूतो भवति सर्वतीर्थफलमश्नुते पतितसंभाषणात् पूतो भवति षङ्क्तिशतसहस्रपावनी भवति शिवसायुज्यमवाप्नोति न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तत इत्यों सत्यमित्युपनिषत् ॥ ४६ सौ रुद्राक्ष शब्दों के उच्चारण से दस गोदान करने का फल प्राप्त होता है । वही भस्म ज्योति रुद्राक्ष भी कहा जाता है । उस रुद्राक्ष को हाथ से छूकर धारण करने मात्र से दो हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है । इन रुद्राक्षों को दोनों कानों में धारण करने से ( पर ) ग्यारह हजार गोदान करने का फल होता है तथा वह एकादश रुद्र के स्वरूप को प्राप्त करता है । उस रुद्राक्ष को शिर से धारण करने पर करोड़ गौओं के दान करने का फल होता है । इन स्थानों के कानों के फल अधिक कहे नहीं जा सकते ॥४८॥ जो इस रुद्राक्ष जाबालो- पनिषद को हमेशा पढ़ता है अथवा जानता है वह बालक हो अथवा जवान हो वह महान् आत्मा होता है । वह गुरु तथा सब मन्त्रों का उपदेश करने वाला होता है । इन्हीं से होम करना चाहिये । इन्हीं से पूजा करनी चाहिए तथा राक्षसों के नाशक, मृत्यु नाशक, रुद्राक्षों को गुरु द्वारा प्राप्त कर, कण्ठ, भुजा अथवा चोटी में बांधना चाहिये । इसकी दक्षिणा के लिये ( गुरु दक्षिणा ) सातों द्वीपों युक्त पृथिवी भी कम है । अतः श्रद्धापूर्वक जिस किसी को दे वही दक्षिणा होती है । जो ब्राह्मण इस उपनिषद को प्रातः पढ़ता है वह रात में किये पापों को नष्ट कर देता है तथा जो सायंकाल पढ़ता है उसके दिन में किये पाप नष्ट हो
रुद्राक्षजाबालोपनिषत् ] [ ३२३ जाते हैं । जो मध्याह्न, ( दोपहर ) में पढ़ता है, उसके छः जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं । प्रतिदिन प्रातः सायं पढ़ने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा छः हजार लाख गायत्री जप के फल को प्राप्त करता है एवं ब्रह्महत्या, सुरापान ( शराब पीना ) सोना चुराना, गुरु की पत्नी से सम्भोग करना, आदि २ पापों के करने पर भी पवित्र हो जाता है तथा सभी तीर्थों के फल को प्राप्त करता है । नीचों से बातचीत करने पर जो पाप लगता है अथवा पुण्यक्षय होता है, उससे भी छूट जाता है एवं वह सैकड़ों हजारों पंक्तियों को ( अर्थात् बहुत अधिक प्राणियों को ) पवित्र करने वाला हो जाता है तथा शिवजी की समीपता को प्राप्त करता है ( अर्थात् सदा शिव के साथ विहरण करता है ) और कभी फिर जन्ममृत्यु के चक्कर में नहीं फँसता ॥३६॥ ॥ रुद्राक्षजाबालोपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ चिन्मयेऽस्मिन्महाविष्णौ जाते दशरथे हरौ । रघोः कुलेऽखिलं राति राजते यो महीस्थितः ॥ १ स राम इति लोकेषु विद्वद्भिः प्रकटीकृतः । राक्षसा येन मरणं यान्ति स्वोद्रेकतोऽथवा ॥ २ रामनाम भुवि ख्यातमभिर मेण वा पुनः । राक्षसान्मर्त्यरूपेण राहुर्मनसिजं यथा ॥ ३ प्रभाहीनांस्तथा कृत्वा राज्यार्हाणां महीभृताम् । धर्ममार्गं चरित्रेण ज्ञानमार्गं च नामतः ॥ ४ तथा ध्यानेन वैराग्यमैश्वर्यं स्वस्य पूजनात् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् [ ३२५ तथा रात्यस्य रामाख्या भुवि स्यादथ तत्त्वतः ॥५ रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥६ भगवान् विष्णु ने जब रघुवंशीय महाराज दशरथ के यहाँ जन्म लिया, तब उनका नाम 'राम' हुआ । विद्वज्जनों ने 'राम' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि जो पृथिवी पर स्थित होकर संतजनों की सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं और जो राजा के रूप में शोभायमान हैं, वे राम हैं । जिनके द्वारा राक्षसगण मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे राम हैं। कुछ विद्वानों ने उन्हें अभिराम होने से राम माना और कुछ ने कहा कि अपनी ही उन्नति से जिनका पृथिवी पर बल प्रसिद्ध हुआ वह राम हैं। राहु जैसे चन्द्रमा को प्रभा- हीन कर देता है, वैसे राक्षसों को प्रभाहीन कर देने से वे राम हैं। कुछ विद्वानों के मत में राज्य प्राप्ति के अधिकारी जो राजा लोग हैं, उनको आदर्श चरित्र उपस्थित कर श्रेष्ठ मार्ग का उपदेश करते हैं तथा ध्यान करने वाले को वैराग्य देते और नामो- च्चारण करने वाले को ज्ञान-मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं तथा जो विग्रहपूजन को ऐश्वर्यवान् बनाते हैं, उनके इन गुणों के कारण ही पृथ्वी पर उनका नाम राम हुआ होगा । परन्तु इससे भिन्न मत यह है कि जिस नित्यानन्द स्वरूप, चिन्मय और अनन्त ब्रह्म में योगीजन लीन रहते हैं, वह परमेश्वर 'राम' के द्वारा ही प्रतिपाद्य है ॥१-६॥ चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः । उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥७ रूपस्थानां देवतानां पुंस्त्र्यङ्गास्त्रादिकल्पना । द्विचत्वारिषदष्टानां दश द्वादश षोडश ॥८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
३२६ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अष्टादशामी कथिता हस्ताः शंखादिभिर्युताः । सहस्रान्तास्तथा तासां वर्णवाहनकल्पना ॥६ शक्तिसेनाकल्पना च ब्रह्मण्येवं हि पञ्चधा । कल्पितस्य शरीरस्य तस्य सेनादिकल्पना ॥१० ब्रह्मादीनां वाचकोऽयं मन्त्रोऽन्वर्यादिसंज्ञिकः । जप्ततव्यो मन्त्रिणा नैवं विना देवः प्रसीदति ॥११ क्रियाकर्मेज्यकर्तॄणामर्थं मन्त्रो वदत्यथ । मननान्त्राणनान्मन्त्रः सर्वं वाच्यस्य वत्त्वकः ॥१२ सोऽभ्यस्यास्य देवस्य विग्रहो यन्त्रकल्पना । विना यन्त्रेण चेत्पूजा देवता न प्रसीदति ॥१३ परमात्म रूप ब्रह्म देह-रहित, अवयव-रहित, अद्वितीय और प्राकृत है, परन्तु भक्तों के इच्छित कार्यों को सिद्ध करने के लिए वह आकार को प्रकट करता है। ॥७॥ परमात्मा के स्वरूप में स्थित देव- ताओं को ही पुरुष, स्त्री, शङ्ख, अस्त्र आदि के रूप में कल्पित किया गया है। भगवान के साकार विभिन्न अवतारों में दो, चार, छः, आठ, बारह, सोलह, अठारह हाथ तक वर्णित हैं । उनमें वे शंख चक्र आदि भी लिये रहते हैं और जब वे विश्व रूप धारण करते हैं तब तो हजारों हाथ होते हैं। उन सब रूपों के विभिन्न रङ्ग तथा वाहन आदि होते हैं। उनके लिये विभिन्न शक्तियों, सेनाओं और शस्त्रों की कल्पना होती है। इस प्रकार सूर्य, गणेश, दुर्गा, विष्णु आदि रूपों में पञ्चभौतिक देह तथा उनके अनुरूप विभिन्न प्रकार की सेना और अनुचर आदि कल्पित हुए हैं ॥ ८-१० ॥ वृक्षादि जड़ पदार्थ, चेतन शरीर तथा ब्रह्मा तक सभी का वाचक यह 'राम' मन्त्र है। इसका जैसा अर्थ है, वैसा ही गुण है। इस मन्त्र की दीक्षा लेकर निरंतर जप करने से भगवान् की प्रसन्नता प्राप्त होती है। साधक गण अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए मंत्र की Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
दीक्षा देते हैं। मनन और त्राण के गुण से सम्पन्न होने के कारण उसे मन्त्र कहते हैं। मन्त्र ही सब अभिधेयों का वाचक है। जो भगवान स्त्री-पुरुष दोनों रूप में प्रतिष्ठित हैं, उनके लिये रूप में विग्रह यन्त्र की रचना की जाती है क्योंकि बिना यन्त्र की अर्चना देवताओं को प्रसन्न करने समर्थ नहीं होती ॥११-१३॥ स्वभू ज्योतिर्मयोऽनन्तरूपी स्वेव भासते। जीवत्वेन समो यस्य सृष्टिस्थितिलयस्य च ॥१॥ कारणत्वेन चिच्छक्त्या रजःसत्त्वतमोगुणैः। तथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महान्द्रुमः ॥२ तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम्। रेफारूढामूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव चेति ॥३ सीतारामौ तन्मयावत्र पूज्यौ जातान्याभ्यां भुवनानि द्विसप्त। स्थितानि च प्राहेतान्येव तेषु ततो रामो मानवो मायया धात् ॥१॥ जगत्प्राणायात्मनेऽस्मै गमः स्यान्नमस्त्वैक्यं प्रवदे- त्प्राग्गुणेनेति ॥२॥ जीववाची नमो नाम चात्मारामेति गीयते। तदात्मिका या चतुर्थी तथा मायेति गीयते ॥१ मन्त्रोऽयं वाचको रामो वाच्यः स्याद्योग एतयोः। फलतश्च व सर्वेषां साधकानां न संशय ॥२ यथा नामी वाचकेन नाम्ना योऽभिमुखो भवेत्। तथा बीजजातम्को मन्त्रोऽमन्त्रिणोऽभिमुखो भवेत् ॥ ३ बीजशक्तिन्यसेद्दक्षवामयोः स्तनयोरपि। कीलो मध्ये विना भाव्यः स्ववाञ्छाविनियोगवान् ॥४ सर्वेषामेव मन्त्राणामेष साधारणः क्रमः। अत्र रामोऽनन्तरूपस्तेजसा वह्निना समः ॥५
३२८ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् सत्त्वनुष्णगुविश्वश्वेदग्नीषोमात्मकं जगत् । उत्पन्नः सीतया भाति चन्द्रश्चन्द्रिकया यथा ॥६ प्रकृत्यासाहितः श्यामः पीतवासा जटाधरः । द्विभुजः कुण्डली रत्नमाली धीरो धनुर्धरः ॥७ प्रसन्नवदनो जेता घृष्टचष्टकविभूषितः । प्रकृत्या परमेश्वर्या जगद्धान्याङ्किताङ्गभृत् ॥८ हेमाभया द्विभुजया सर्वालंकृतया चिता । श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोसलजात्मजः ॥९ दक्षिणे लक्ष्मणेनाथ सधनुष्पाणिना पुनः । हैमाभेनानुजेनव तथा कोणत्रयं भवेत् ॥१० साकार होनेवाले परमेश्वर स्वयंभू कहलाते हैं क्योंकि उनके प्रकट करने में कोई कारण रूप नहीं होता, वे स्वयं ही उत्पन्न होते हैं। वे ज्योति स्वरूप हैं और अपने प्रकाश से सदा प्रकाशित रहते हैं। वे साकार होने पर भी अनन्त रहते हैं । क्योंकि वे देश, काल आदि की सीमा में सीमित नहीं रहते। वे अपनी चैतन्य शक्ति प्राण रूप से सभी देह धारियों में स्थित रहते हैं और वे ही सत्व, रज, तम गुणों के द्वारा विश्व की सृष्टि, रक्षा और अन्त करने में समर्थ हैं । इन गुणों के कारण ही संसार प्रत्यक्ष दिखाई देता है । परन्तु यह दृष्टिगोचर संसार भी ओंकार रूप ही है । जैसे महान् वट वृक्ष अपने छोटे से बीज में स्थित रहता है वैसे ही यह विशाल विश्व रामबीज में स्थित है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीनों तथा उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली शक्तियाँ,नाद-बिन्दु और बीज से उत्पन्न रौद्री, ज्येष्ठा और वामा- यह सभी राम के 'रकार' पर टिके हुए हैं । इस बीज मन्त्र में पूजनीय सीता रूप प्रकृति और राम रूप पुरुष हैं। चौदहों भुवन इन दोनों से ही प्रकट हुए हैं। यह लोक इन दोनों के ही आश्रित हैं। इन सब का लय भी ओंकार रूप ब्रह्मा, विष्णु, शिव में ही होता है। राम ने
लीलापूर्वक ही अपने को मनुष्य रूप में प्रकट किया है। इन विश्व- प्राण और विश्वात्मा राम को नमस्कार है। इस प्रकार नमन के पश्चात् गुणों से भी पूर्व प्रकट हुए परब्रह्म रूप राम के साथ अपने एकीभाव का अनुभव करता हुआ 'मैं ही रामरूप ब्रह्म हूँ' इस प्रकार उच्चारण करे ॥ १-४ ॥ 'राम' के द्वारा आत्मा प्रतिपादित होती है और नमः जीव वाचक है। राम के साथ मिली हुई विभक्ति से जीव और आत्मा के एकीभाव का वर्णन किया जाता है। 'रामाय नमः' मन्त्र के राम ही वाच्य हैं, इन दोनों के सम्मिलित से सब उपासकों को इच्छित फल प्राप्त होता है। जैसे जिस किसी का नाम लिया जाय, वह अपने नाम की पुकार सुनकर तुरन्त सामने आता है, वैसे ही बीज रूप मन्त्र राम का उच्चारण किये जाने पर राम भी साधक के समक्ष प्रत्यक्ष होते हैं। बीज का दक्षिण स्तन पर और शक्ति का वाम स्तन पर तथा कीलक का हृदय के मध्य में न्यास और कामना-सिद्धि निमित्त विनियोग करे। जब ध्यान किया जाए तब दशरथ तनय श्रीराम में अनन्त, अविनाशी परमेश्वर की भावना करनी चाहिए। उन्हें अत्यन्त तेजोमय अग्नि के समान मानना चाहिए। जब वे सौम्य कान्ति वाली श्रीसीता जी से युक्त होते हैं, तब वे अग्निषो- मात्मक विश्व के कारणभूत होते हैं। जैसे चन्द्रमा के साथ अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही राम सीता के साथ अत्यन्त सुशोभित होते हैं ॥ १-६ ॥ श्रीराम अपनी आह्लादनी शक्ति सीता के साथ सुशोभित हैं। वे श्याम वर्ण के हैं। उनके देह पर पीताम्बर सिर पर जटायें, कानों में कुण्डल तथा कंठ में श्रेष्ठ रत्नों की मालायें पड़ी हैं। उनके दो भुजायें हैं। वे स्वभाव से धीर और सदा प्रसन्न मुख वाले हैं। वे धनुर्धारी राम युद्ध में सदा जीतते हैं। अणिमा आदि आठों ऐश्वर्यभूता शक्तियां उनकी शोभा वृद्धि करती हैं। वाम अंग में संसार की कारण
[Header] ३३० ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् रूपिणी सीता जी सुशोभित हैं । वे सुवर्ण के समान उज्ज्वल कान्ति वाली हैं। वे दो भुजा वाली सीता दिव्य अलंकारों से अलंकृत और हाथ में सुन्दर कमल पुष्प लिए हुए हैं। उनके साथ विराजमान श्रीराम सुन्दर और पुष्ट लगते हैं। राम के दक्षिण ओर उनके लघु भ्राता गौरवपूर्ण लक्ष्मण जी खड़े हैं, उनके हाथों में धनुष बाण है। इन तीनों के इस प्रकार प्रतिष्ठित होने से एक सुशोभित त्रिकोण की सृष्टि होती है ॥७-१०॥ तथैव तस्य मन्त्रस्य यस्यानुश्च स्वडेन्तया । एव त्रिकोणरूपं स्यात्तं देवा ये समाययुः ॥११ स्तुतिं चक्रुश्च जगतः पतिं कल्पतरौ स्थितम् । कामरूपाय रामाथ नमो मायामयाय च ॥१२ नमा वेदादिरूपाय ओङ्काराय नमो नमः । रमाधराय रामाय श्रीरामायात्ममूर्तये ॥१३ जानकीदेहभूषाय रक्षोघ्नाय शुभाङ्गिने । भद्राय रघुवीराय दशास्यान्तकरूपिणे ॥१३ रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । भो दशास्यान्तकास्माकं रक्षां देहि श्रियं च ते ॥१५ त्वमैश्वर्यं दापयाथ सप्रत्याश्चरिमारणम् । कुर्विति स्तुत्य देवाद्यास्तेन सार्धं सुखं स्थिताः ॥१६ स्तुवन्त्येवं हि ऋषयस्तदा रावण आसुरः । रामपत्नीं वनस्थां यः स्वनिवृत्त्यर्थमाददे ॥१७ स रावण इति ख्यातो यद्वा रावाच्च रावणः । तन्वाजेनेक्षितुं सीतां रामो लक्ष्मण एव च ॥१८ विचेरतुस्तदा भूमौ देवीं संहृश्च चासुरम् । हृत्वा कबन्धं शबरीं गत्वा तस्याज्ञया तया ॥१९ पूजितो वायुपुत्रेण भक्तेन च कपीश्वरम् । आहूय शंसततां सर्वमाद्यन्तं रामलक्ष्मणौ ॥२०
रामपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३३१ स तु रामे शङ्कितः सन्प्रत्ययार्थं च दुन्दुभेः । विग्रहं दर्शयामास यो रामस्तमचिक्षिपत् ॥२१ सप्त सालान्विभिद्याशु मोदते राघवस्तदा । तेन हृष्टः कपीन्द्रोऽसौ स रामस्तस्य पत्तनम् ॥२२ जगामागर्जदनुजो वालिनो वेगतो गृहात् । तदा वाली निर्जगाम तं बालिनमथाहवे ॥२३ निहत्य राघवो राज्ये सुग्रीवं स्थापयत्ततः । हरीनाहूय सुग्रीवस्त्ववाह चाशाविदोऽधुना ॥२४ राम मंत्र का बीज जैसे 'राम' है, वैसे ही अब उसका शेषांश कहा जाता है। राम शब्द के चतुर्थ्यन्त रूप में नमः मिलने से 'रां रामाय नमः' बनता है। यदि यह षडक्षर मन्त्र सिद्ध हो जाय तो छः कोण बनते हैं। एक समय की बात है—देवगण भगवान राम के दर्शनार्थ पधारे। उस समय श्रीराम कल्पवृक्ष के नीचे एक जटित सिंहासन पर विराजमान थे। देवगण उनके दर्शन कर इस प्रकार स्तवन करने लगे— 'काम रूप से युक्तं माया रूप के धारण करने वाले श्रीराम को नमस्कार है। वेद के आदि रूप ओंकार स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। सीता रूप रमा के धारण करने वाले, नयनाभिराम एवं आत्मा स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। श्रीराम जी का देह ही जिनका अलंकार है और जो राक्षसों के मारने वाले हैं, जो रावण के लिए मृत्यु रूप तथा कल्याणमय विग्रह से युक्त श्रीराम को नमस्कार है। हे नृपोत्तम, हे दशमुख विना- शक, हे महाधनुर्धर श्रीराम हमारी रक्षा करो। हमें अपने से सम्बन्धित श्री से सम्पन्न करो।' 'हे श्रीराम हमको ऐश्वर्य प्राप्त कराओ।' इस प्रकार देवगण उनकी स्तुति करते रहे। जब तक श्रीराम खर नामक राक्षस का संहार करने में लगे, तब तक देवताओं ने और ऋषियों ने भी उनकी
३३२ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् स्तुति की। जब खर और उनके साथी राक्षस मारे गये तब राक्षस-राज रावण ने वन में पहुँचकर श्रीसीता जी का हरण कर लिया। 'वन' से सीता का हरण करने के कारण उस राक्षस को 'रावण' कहा गया क्योंकि राम शब्द से 'रा' और 'वन' से 'वन' लेने पर रावण नाम बन जाता है। अथवा जो दूसरों को रुलावे वह रावण कहा जाता है। एक समय की बात है—रावण ने कैलाश को उठा लिया तब शिवजी ने कैलाश को इतना भारी कर दिया कि वह उसे ही दाबने लगा। तब तो उसने बड़ा भारी रव (शोर) किया, इसी से उसका नाम रावण हुआ। सीता हरण के पश्चात् राम और लक्ष्मण दोनों ही उनकी खोज के निमित्त वन में विचरण करने लगे। तभी उनके सामने कबन्ध नामक एक राक्षस आया, उन्होंने उसे मार डाला और उसके कहने से वे शबरी के आश्रम पर गये। वहाँ शबरी ने उनका अत्यन्त भक्ति-भाव से सत्कार किया। फिर आगे चलने पर वायु पुत्र हनुमान से उनकी भेंट हुई। उन्होंने सुग्रीव को बुलाकर इन दोनों से मेल कराया और मैत्री होने पर राम-लक्ष्मण ने अपना सब हाल उनसे कहा। सुग्रीव ने राम के अधिक पराक्रमी होने में संदेह किया और वाली द्वारा मारे हुए दुंदुभि नामक राक्षस का देह राम को दिखाया। राम ने उस राक्षस के शरीर को बात की बात में बहुत दूर फेंक दिया। और अपने एक बाण से ताड़ के सात वृक्षों को गिरा कर सुग्रीव के संदेह की निवृत्ति की। इससे सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके पश्चात् श्रीराम सुग्रीव के नगर में पहुँचे। वहाँ सुग्रीव ने घोर गर्जना कर वाली को युद्ध के लिए ललकारा। तब बाली भी घोर गर्जना करता हुआ अपने घर से दौड़ा हुआ आया। उस समय युद्ध में बाली श्रीराम के द्वारा मारा गया और किष्किन्धा की राजगद्दी पर सुग्रीव का अभिषेक हुआ ॥ ११-२४ ॥
रामपूर्वंतापिन्युपनिषत् ] [ ३३३ आदाय मैथिलीमय ददताञ्चाशु गच्छत । ततस्ततार हनुमान्ब्धिं लङ्कां समाययौ ॥२५ सीतां दृष्ट्वाऽसुरान्हत्वा पुरं दग्ध्वा तथा स्वयम् । आगत्य रामेण सह न्यवेदयत् तत्त्वतः ॥२६ तदा रामः क्रोधिरूपी तानाहूयाथ वानरान् । तैः सार्धमादायस्त्राणि पुरीं लंकां समाययौ ॥२७ तां दृष्ट्वा तदधीशेन सार्धं युद्धमकारयत् । घटश्रोत्रसहस्राक्षजिद्भ्यां युक्तं तमाहवे ॥२८ हत्वा विभीषणं तत्र स्थाप्याथ जनकात्मजाम् । आदायाङ्कस्थितां कृत्वा स्वपुरं तैर्जगाम सः ॥२६ ततः सिंहासनस्थः सन् द्विभुजो रघुनन्दनः । धनुर्धरः प्रसन्नात्मा सर्वाभरणभूषितः ॥३० मुद्रां ज्ञानमयीं याम्ये वामे तेजः प्रकाशिनीम् । धृत्वा व्याख्याननिरतश्चिन्मयः परमेश्वरः ॥३१ उदग्दक्षिणयोः स्वस्य शत्रुघ्नभरतौ ततः । हनूमन्तं च श्रोतारमग्रतः स्यान्त्रिकोणगम् ॥३२ भरताधस्तु सुग्रीवं शत्रुघ्नाधो विभीषणम् । पश्चिमे लक्ष्मणं तस्य धृतच्छत्त्रं सचामरम् ॥३३ तदधस्तौ तालवृन्तकरौ त्र्यस्रं पुनर्भवेत् । एवं षट्कोणमादौ स्वदीर्घाङ्गै रेष सयुतः ॥३४ द्वितीयं वासुदेवाद्यैराग्नेयादिषु संयुतः । तृतीय वायुसूनुं च सुग्रीवं भरतं तथा ॥३५ विभीषणं लक्ष्मणं च अङ्गद चारिमर्दनम् । जाम्बवन्तं च र्यु क्तस्ततो धृष्टिर्जयन्तकः ॥३६
३३४ ] [रामपूर्वतापिन्युपनिषत् विजयश्च सुराष्ट्रश्च राष्ट्रवर्धन एव च । अशोको धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चैभिरावृतः ॥३७ ततः सहस्रहग्वह्निर्धर्मज्ञो वरुणोऽनिलः । इन्द्रीशधालनन्ताश्च दशभिश्चैभिरावृतः ॥३८ बहिस्तदायुधैः पूज्यो नीलादिभिरलंकृतः । वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः समुपासितः ॥३९ इसके पश्चात् सुग्रीव ने अपने वानरों को बुलाकर कहा— वीरो ! तुम से कोई दिशा छिपी हुई नहीं है । अतः तुम शीघ्र ही यहाँ से जाकर श्री सीता जी की खोज करो । आज ही लौट कर इसकी सूचना भगवान् श्रीराम को सुनाओ । फिर हनुमान जी समुद्र को लांघकर लङ्का में जा पहुंचे । वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा और अनेक राक्षसों को मारकर लंका को जला डाला । फिर वे लौट- कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और उनको सब समाचार सुनाया । उस समय श्रीराम को अत्यन्त क्रोधावेश हुआ और वानरों को साथ लेकर लङ्का की ओर चल पड़े । लंका पर आक्रमण करने के लिए उसका निरीक्षण किया गया और फिर युद्ध छिड़ गया । लङ्कापति रावण का भाई कुम्भकर्ण मारा गया । फिर इन्द्रजीत और रावण भी युद्ध में मारे गये । तब विभीषण को लङ्का का राज्य देकर श्रीराम ने सीता जी को अपने वामाङ्ग में प्रतिष्ठित किया और सब वानरों को साथ लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े । भगवान् श्रीराम अयोध्या के राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो गये । उन धनुर्धर राम का स्वभाव ही प्रसन्न रहने का है । वे सब प्रकार के अलंकारों से अलंकृत हैं । उनके दक्षिण हाथ में ज्ञानमयी मुद्रा और वाम हाथ में तेज को प्रकाशित करने वाली धनुर्मयी मुद्रा स्थित है । इस प्रकार द्विभुज रूपधारी श्रीराम स्वयं
रामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३३५ व्याख्यान मुद्रा में स्थित हो रहे हैं। अब श्रीराम के उत्तर भाग में शत्रुघ्न और दक्षिण भाग में भरत हैं। हनुमान जी श्रीराम के सम्मुख करबद्ध खड़े हैं। यह भी त्रिकोण में स्थित हैं। भरत के नीचे की ओर सुग्रीव तथा शत्रुघ्न के नीचे की ओर विभीषण खड़े हुये हैं। श्रीराम के पीछे लक्ष्मण अपने हाथों में छत्र-चँवर लिए हुये बैठे हैं। भरत-शत्रुघ्न के हाथों में ताड़ के पंखे हैं। इस प्रकार लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एक त्रिकोण का स्थिति में हैं। भगवान श्रीराम अपने बीजमन्त्र वाले दीर्घ अक्षरों के आवरण में घिरे बैठे हैं । भगवान राम के आग्नेय आदि दिशाओं की ओर वासुदेव, संकर्षण, शान्ति, श्री, सरस्वती, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और रति हैं । श्रीराम इनसे युक्त रहते हुये द्वितीय आवरण में घिरे हैं। भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान् और विभीषण जब श्रीराम के साथ होते हैं तब तृतीय आवरण होता है। राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, सुराष्ट्र, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुमन्त और धर्मपाल के सहित भी तीसरा आवरण ही सिद्ध होता है । तब ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, निऋं'ति, अनन्त और ईशान इन दस दिक्पालों से श्रीराम के आवृत होने पर चतुर्थ आवरण बन जाता है। इन दिक्पालों के बाहरी भाग में इनके आयुध रहते हैं। इसी आवरण में नल आदि बानर भगवान् को सुशोभित करते हैं। उनके साथ ही वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि भी श्रीराम की उपासना में लीन दिखाई देते हैं ॥२५-३६॥ एवमुद्दे शतः प्रोक्तं निर्देशस्तस्य चाधुना । त्रिरेखापुटमालिख्य मध्ये तारद्वयं लिखेत् ॥ ४० तन्मध्ये बीजमालिख्य तदधः साध्यमालिखेत् । द्वितीयान्तं च तस्योर्ध्वं षष्ठ्यन्तं साधकं तथा ॥ ४१
३३६ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत्
कुरु द्वयं च तत्पार्श्वे लिखेद्बीजान्तरे रमाम् । तत्सर्वं प्रणवाभ्यां च वेष्टयेच्छुद्धबुद्धिमान् ॥ ४२ दीर्घभाजि षडस्रे तु लिखेद्बीजं हृदादिभिः । कोणपार्श्वे रमामाये वदग्रेऽनङ्गमालिखेत् ॥ ४३ क्रोधं कोणाग्रान्तरेषु लिख्य मन्त्र्यभितो गिरम् । वृत्तत्रयं साष्टपत्रं सरोजे विलिखेत्स्वरान् ॥ ४४ केसरे चाष्टपत्रे च वर्गाष्टकमथालिखेत् । तेषु मालामनोर्वर्णान्विलिखेदूर्भिसंख्यया ॥ ४५ अन्ते पञ्चाक्षराण्येष्वं पुनरष्टदलं लिखेत् । तेषु नारायणाष्टार्णाँल्लिख्य तत्केसरे रमाम् ॥ ४६ तद्बहिर्द्वादशदलं विलिखेद्द्वादशाक्षरम् । अथोंनमो भगवते बासुदेवाय इत्ययम् ॥ ४७
पूजा यन्त्र का संक्षिप्त वर्णन किया गया । अब उसका निर्देश करते हैं । सम रेखाओं के दो त्रिकोण बनाकर उनके बीच में पृथक्-पृथक् प्रणव लिखे, फिर उन दोनों के मध्य में आद्यबीज लिखे और उसके नीचे जो कार्य सिद्ध करना है, उसका उल्लेख करे । साध्य का नाम द्वितीयान्त हो और आद्यबीज के शीर्ष भाग में साधक का नाम षष्ट्यन्त रहे । फिर बीज के इधर-उधर एक-एक कुरुपद का उल्लेख करे । बीज के मध्य भाग में तथा साध्य के ऊपर श्री लिखे । यह सब इस प्रकार लिखने चाहिये कि वे दोनों प्रणवों में सम्पुटित रहें । तत्पश्चात् छहों कोणों में दीर्घ स्वर वाले मूल बीज को उल्लिखित करे । फिर एक-एक के साथ हृदयाय नमः और शिर से स्वाहा लिखे । कोणों के बगल में श्रीं, ह्रीं, क्लीं लिखे और कोण के अगले भाग में हुम् और हुम् के दोनों ओर ऐं लिखना चाहिये । इसके पश्चात् तीन वृत्त बनाकर वृत्तों के साथ
रामपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३३७ ही आठ दल वाला कमल बनावे । कमल की केसर में दो-दो अक्षर के क्रमपूर्वक सब स्वर वर्णों को लिखना चाहिए । कमल के आठ दलों में छः छः वर्ण के क्रम से उल्लेख करे । माला-मन्त्र के सैंतालीस वर्ण पूरे करने के लिए आठवें दल में पांच वर्ण ही रह जायेंगे । ऊपर बताये ढङ्ग से पुनः एक कमल बनाकर उसकी आठों पंखुड़ियों पर 'ॐ नमो नारायण' मन्त्र के एक-एक अक्षर को लिखे, उसके केसर में श्री लिखे । उसके ऊपर बारह पंखड़ियों का कमल बनाकर उसकी प्रत्येक पंखुड़ी पर द्वादशाक्षर मन्त्र का एक-एक अक्षर लिखना चाहिए ॥४०-४७॥ आदिक्षान्तान्केसरेषु वृत्ताकारेण संलिखेत् । तद्वहिः षोडशदलं लिख्य तत्केसरे ह्रियप्र । वर्मस्त्रिनतिसंयुक्तं दलेषु द्वादशाक्षरम् । तत्सन्धिष्विरजादीनां मन्त्रान्मन्त्री समालिखेत् ॥ ४८ हं सं भ्रं वं लूं श्रं ञं च लिखेत्सम्यक्ततो वहिः । द्वात्रिंशारं महापद्मं नादबिन्दुसमायुतम् ॥ ५० विलिखेन्मन्त्रराजाणांस्तेषु दात्रेषु यत्नतः । ध्यायेदष्टवसूनेकादशरुद्रांश्च तत्र वै ॥ ५१ द्वादशेनांश्च धातारं वषट्कारं च तद्बहिः । भूपृहं वज्रशूलाढ्यं रेखात्रयसमन्वितम् ॥ ५२ द्वारोपेतं च राश्यादिभूषितं फणिसंयुतम् । अनन्तो वासुकिश्चैव तक्षः कर्को पद्मऋः ॥ ५३ महापद्मश्च शङ्खश्च गुलिकोऽष्टौ प्रकीर्त्तिताः । एवं मण्डलमालिख्य तस्य दिक्षु विदिक्षुच ॥ ५४