भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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[Page Header] रुद्राक्षजाबालोपनिषत् [ ३२१

[Main Text] आदि कालाग्नि रुद्र के चारों तरफ बैठ गये तथा भगवान कालाग्नि रुद्र के यह पूछे जाने पर कि आप लोग क्यों आये हैं ? बोले—हम सब रुद्राक्ष धारण की विधि को सुनना चाहते हैं ॥४६॥ तब कालाग्नि रुद्र बोले—रुद्र के नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण से यह रुद्राक्ष नाम से प्रसिद्ध है। भगवान सदा शिव संहार के समय ( प्रलय काल में ) संहार करके अपने संसार का संहार करने वाले नेत्र को मुकुलित कर लेते हैं ( जरा से खुले तथा अधिकतया बन्द ) उन्हीं से उत्पन्न रुद्राक्ष है । यही रुद्राक्ष का अपना स्वत्व है । इस प्रकार कालाग्नि ने उत्तर दिया ॥४७॥

तद्रुद्राक्षे वाग्विषये कृते दशगोप्रदानेन यत् फलमवाप्नोति तत् फलमश्नुते । स एव भस्मज्योती रुद्राक्ष इति । तद्रुद्राक्षं करेण स्पृष्ट्वा धारणमात्रेण द्विसहस्रगोप्रदानफलं भवति । तद्रु- द्राक्षं कर्णयोर्धार्यमाणे एकादशसहस्रगोप्रदानफलं भवति । एका- दशरुद्रत्वं च गच्छति । तद्रुद्राक्षे शिरसि धार्यमाणे कोटिगो- प्रदानफलं भवति । एतेषां स्थानानां कर्णयोः फलं वक्तुं न शक्यमिति होवाच ॥ ४८

य इमां रुद्राक्षजाबालोपनिषदं नित्यमधीते बालो वा युवा वा वेद स महान् भवति । स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवति । एतैरेव होमं कुर्यात् । एतैरेवार्चनम् । तथा राक्षोघ्नं मृत्युतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नोत । सप्त- द्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते । तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात् सा दक्षिणा भवति । य इमामुपनिषदं ब्राह्मणः पातर- धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधियानो दिवसकृतपापं