१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२२ ] [ रुद्राक्षजाबालोपनिषत् नाशयति । मध्याह्नेऽधीयानः षड्जन्मकृतषापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽनेकजन्मकृतपापं नाशयति षट्सहस्रलक्षगायत्री- जपफलमवाप्नोति ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयगुरुदारगमनतत्सं- योगपातकेभ्यः पूतो भवति सर्वतीर्थफलमश्नुते पतितसंभाषणात् पूतो भवति षङ्क्तिशतसहस्रपावनी भवति शिवसायुज्यमवाप्नोति न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तत इत्यों सत्यमित्युपनिषत् ॥ ४६ सौ रुद्राक्ष शब्दों के उच्चारण से दस गोदान करने का फल प्राप्त होता है । वही भस्म ज्योति रुद्राक्ष भी कहा जाता है । उस रुद्राक्ष को हाथ से छूकर धारण करने मात्र से दो हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता है । इन रुद्राक्षों को दोनों कानों में धारण करने से ( पर ) ग्यारह हजार गोदान करने का फल होता है तथा वह एकादश रुद्र के स्वरूप को प्राप्त करता है । उस रुद्राक्ष को शिर से धारण करने पर करोड़ गौओं के दान करने का फल होता है । इन स्थानों के कानों के फल अधिक कहे नहीं जा सकते ॥४८॥ जो इस रुद्राक्ष जाबालो- पनिषद को हमेशा पढ़ता है अथवा जानता है वह बालक हो अथवा जवान हो वह महान् आत्मा होता है । वह गुरु तथा सब मन्त्रों का उपदेश करने वाला होता है । इन्हीं से होम करना चाहिये । इन्हीं से पूजा करनी चाहिए तथा राक्षसों के नाशक, मृत्यु नाशक, रुद्राक्षों को गुरु द्वारा प्राप्त कर, कण्ठ, भुजा अथवा चोटी में बांधना चाहिये । इसकी दक्षिणा के लिये ( गुरु दक्षिणा ) सातों द्वीपों युक्त पृथिवी भी कम है । अतः श्रद्धापूर्वक जिस किसी को दे वही दक्षिणा होती है । जो ब्राह्मण इस उपनिषद को प्रातः पढ़ता है वह रात में किये पापों को नष्ट कर देता है तथा जो सायंकाल पढ़ता है उसके दिन में किये पाप नष्ट हो