१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२८ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् सत्त्वनुष्णगुविश्वश्वेदग्नीषोमात्मकं जगत् । उत्पन्नः सीतया भाति चन्द्रश्चन्द्रिकया यथा ॥६ प्रकृत्यासाहितः श्यामः पीतवासा जटाधरः । द्विभुजः कुण्डली रत्नमाली धीरो धनुर्धरः ॥७ प्रसन्नवदनो जेता घृष्टचष्टकविभूषितः । प्रकृत्या परमेश्वर्या जगद्धान्याङ्किताङ्गभृत् ॥८ हेमाभया द्विभुजया सर्वालंकृतया चिता । श्लिष्टः कमलधारिण्या पुष्टः कोसलजात्मजः ॥९ दक्षिणे लक्ष्मणेनाथ सधनुष्पाणिना पुनः । हैमाभेनानुजेनव तथा कोणत्रयं भवेत् ॥१० साकार होनेवाले परमेश्वर स्वयंभू कहलाते हैं क्योंकि उनके प्रकट करने में कोई कारण रूप नहीं होता, वे स्वयं ही उत्पन्न होते हैं। वे ज्योति स्वरूप हैं और अपने प्रकाश से सदा प्रकाशित रहते हैं। वे साकार होने पर भी अनन्त रहते हैं । क्योंकि वे देश, काल आदि की सीमा में सीमित नहीं रहते। वे अपनी चैतन्य शक्ति प्राण रूप से सभी देह धारियों में स्थित रहते हैं और वे ही सत्व, रज, तम गुणों के द्वारा विश्व की सृष्टि, रक्षा और अन्त करने में समर्थ हैं । इन गुणों के कारण ही संसार प्रत्यक्ष दिखाई देता है । परन्तु यह दृष्टिगोचर संसार भी ओंकार रूप ही है । जैसे महान् वट वृक्ष अपने छोटे से बीज में स्थित रहता है वैसे ही यह विशाल विश्व रामबीज में स्थित है । ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीनों तथा उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली शक्तियाँ,नाद-बिन्दु और बीज से उत्पन्न रौद्री, ज्येष्ठा और वामा- यह सभी राम के 'रकार' पर टिके हुए हैं । इस बीज मन्त्र में पूजनीय सीता रूप प्रकृति और राम रूप पुरुष हैं। चौदहों भुवन इन दोनों से ही प्रकट हुए हैं। यह लोक इन दोनों के ही आश्रित हैं। इन सब का लय भी ओंकार रूप ब्रह्मा, विष्णु, शिव में ही होता है। राम ने