भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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लीलापूर्वक ही अपने को मनुष्य रूप में प्रकट किया है। इन विश्व- प्राण और विश्वात्मा राम को नमस्कार है। इस प्रकार नमन के पश्चात् गुणों से भी पूर्व प्रकट हुए परब्रह्म रूप राम के साथ अपने एकीभाव का अनुभव करता हुआ 'मैं ही रामरूप ब्रह्म हूँ' इस प्रकार उच्चारण करे ॥ १-४ ॥ 'राम' के द्वारा आत्मा प्रतिपादित होती है और नमः जीव वाचक है। राम के साथ मिली हुई विभक्ति से जीव और आत्मा के एकीभाव का वर्णन किया जाता है। 'रामाय नमः' मन्त्र के राम ही वाच्य हैं, इन दोनों के सम्मिलित से सब उपासकों को इच्छित फल प्राप्त होता है। जैसे जिस किसी का नाम लिया जाय, वह अपने नाम की पुकार सुनकर तुरन्त सामने आता है, वैसे ही बीज रूप मन्त्र राम का उच्चारण किये जाने पर राम भी साधक के समक्ष प्रत्यक्ष होते हैं। बीज का दक्षिण स्तन पर और शक्ति का वाम स्तन पर तथा कीलक का हृदय के मध्य में न्यास और कामना-सिद्धि निमित्त विनियोग करे। जब ध्यान किया जाए तब दशरथ तनय श्रीराम में अनन्त, अविनाशी परमेश्वर की भावना करनी चाहिए। उन्हें अत्यन्त तेजोमय अग्नि के समान मानना चाहिए। जब वे सौम्य कान्ति वाली श्रीसीता जी से युक्त होते हैं, तब वे अग्निषो- मात्मक विश्व के कारणभूत होते हैं। जैसे चन्द्रमा के साथ अत्यन्त शोभा होती है, वैसे ही राम सीता के साथ अत्यन्त सुशोभित होते हैं ॥ १-६ ॥ श्रीराम अपनी आह्लादनी शक्ति सीता के साथ सुशोभित हैं। वे श्याम वर्ण के हैं। उनके देह पर पीताम्बर सिर पर जटायें, कानों में कुण्डल तथा कंठ में श्रेष्ठ रत्नों की मालायें पड़ी हैं। उनके दो भुजायें हैं। वे स्वभाव से धीर और सदा प्रसन्न मुख वाले हैं। वे धनुर्धारी राम युद्ध में सदा जीतते हैं। अणिमा आदि आठों ऐश्वर्यभूता शक्तियां उनकी शोभा वृद्धि करती हैं। वाम अंग में संसार की कारण