भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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रामपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३३१ स तु रामे शङ्कितः सन्प्रत्ययार्थं च दुन्दुभेः । विग्रहं दर्शयामास यो रामस्तमचिक्षिपत् ॥२१ सप्त सालान्विभिद्याशु मोदते राघवस्तदा । तेन हृष्टः कपीन्द्रोऽसौ स रामस्तस्य पत्तनम् ॥२२ जगामागर्जदनुजो वालिनो वेगतो गृहात् । तदा वाली निर्जगाम तं बालिनमथाहवे ॥२३ निहत्य राघवो राज्ये सुग्रीवं स्थापयत्ततः । हरीनाहूय सुग्रीवस्त्ववाह चाशाविदोऽधुना ॥२४ राम मंत्र का बीज जैसे 'राम' है, वैसे ही अब उसका शेषांश कहा जाता है। राम शब्द के चतुर्थ्यन्त रूप में नमः मिलने से 'रां रामाय नमः' बनता है। यदि यह षडक्षर मन्त्र सिद्ध हो जाय तो छः कोण बनते हैं। एक समय की बात है—देवगण भगवान राम के दर्शनार्थ पधारे। उस समय श्रीराम कल्पवृक्ष के नीचे एक जटित सिंहासन पर विराजमान थे। देवगण उनके दर्शन कर इस प्रकार स्तवन करने लगे— 'काम रूप से युक्तं माया रूप के धारण करने वाले श्रीराम को नमस्कार है। वेद के आदि रूप ओंकार स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। सीता रूप रमा के धारण करने वाले, नयनाभिराम एवं आत्मा स्वरूप श्रीराम को नमस्कार है। श्रीराम जी का देह ही जिनका अलंकार है और जो राक्षसों के मारने वाले हैं, जो रावण के लिए मृत्यु रूप तथा कल्याणमय विग्रह से युक्त श्रीराम को नमस्कार है। हे नृपोत्तम, हे दशमुख विना- शक, हे महाधनुर्धर श्रीराम हमारी रक्षा करो। हमें अपने से सम्बन्धित श्री से सम्पन्न करो।' 'हे श्रीराम हमको ऐश्वर्य प्राप्त कराओ।' इस प्रकार देवगण उनकी स्तुति करते रहे। जब तक श्रीराम खर नामक राक्षस का संहार करने में लगे, तब तक देवताओं ने और ऋषियों ने भी उनकी