भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३३२ ] [ रामपूर्वतापिन्युपनिषत् स्तुति की। जब खर और उनके साथी राक्षस मारे गये तब राक्षस-राज रावण ने वन में पहुँचकर श्रीसीता जी का हरण कर लिया। 'वन' से सीता का हरण करने के कारण उस राक्षस को 'रावण' कहा गया क्योंकि राम शब्द से 'रा' और 'वन' से 'वन' लेने पर रावण नाम बन जाता है। अथवा जो दूसरों को रुलावे वह रावण कहा जाता है। एक समय की बात है—रावण ने कैलाश को उठा लिया तब शिवजी ने कैलाश को इतना भारी कर दिया कि वह उसे ही दाबने लगा। तब तो उसने बड़ा भारी रव (शोर) किया, इसी से उसका नाम रावण हुआ। सीता हरण के पश्चात् राम और लक्ष्मण दोनों ही उनकी खोज के निमित्त वन में विचरण करने लगे। तभी उनके सामने कबन्ध नामक एक राक्षस आया, उन्होंने उसे मार डाला और उसके कहने से वे शबरी के आश्रम पर गये। वहाँ शबरी ने उनका अत्यन्त भक्ति-भाव से सत्कार किया। फिर आगे चलने पर वायु पुत्र हनुमान से उनकी भेंट हुई। उन्होंने सुग्रीव को बुलाकर इन दोनों से मेल कराया और मैत्री होने पर राम-लक्ष्मण ने अपना सब हाल उनसे कहा। सुग्रीव ने राम के अधिक पराक्रमी होने में संदेह किया और वाली द्वारा मारे हुए दुंदुभि नामक राक्षस का देह राम को दिखाया। राम ने उस राक्षस के शरीर को बात की बात में बहुत दूर फेंक दिया। और अपने एक बाण से ताड़ के सात वृक्षों को गिरा कर सुग्रीव के संदेह की निवृत्ति की। इससे सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। इसके पश्चात् श्रीराम सुग्रीव के नगर में पहुँचे। वहाँ सुग्रीव ने घोर गर्जना कर वाली को युद्ध के लिए ललकारा। तब बाली भी घोर गर्जना करता हुआ अपने घर से दौड़ा हुआ आया। उस समय युद्ध में बाली श्रीराम के द्वारा मारा गया और किष्किन्धा की राजगद्दी पर सुग्रीव का अभिषेक हुआ ॥ ११-२४ ॥